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शनिवार, 23 अक्तूबर 2021

दूध-भात

नदिया के तीर मां नानकून गांव- ‘जामगांव’। जामगांव के बड़े गंउटिया बेलास ह संझउती बेरा अंगना म बिछे खटिया मां बइठे रिहिस अउ तीर म पीड़हा मां बइठे रिहिस खम्मन ह। दूनो झन चाहा पीयत रिहिन। खम्मन पहिली बइला कोचिया रिहिस। गांव-गांव जाके बइला-भंइसा बेचय। फेर अब जुग बदलगे। किसानी करे के तरीका बदलगे। नांगर, बइला, गाड़ा नंदागे। टेकटर आगे। ओकरे सेती खम्मन के धंधा घलो चउपट होगे। खम्मन सोचिस अब का करे जाय?
खम्मन देखिस आजकल साहर अउ गांव मां नावा फेसन उगे हावय - कुकुर पोसे के। उही पाय के खम्मन ह बइला-भइंसा बेचे ल छोड़के कुकुर बेचे ल धर लिस अउ बइला कोचिया ले कुकुर कोचिया बनगे। बेलास गंउटिया ह खम्मन ल एक ठन सुग्घर कुकुर मंगाए रिहिस पोसे बर।
खम्मन ह एक ठन भोकण्ड कुकुर ल लान के बखान करत किहिस- "गउंटिया! ए कुकुर ह हिन्दी, छत्तीसगढ़ी नइ जाने, अंगरेजी जानथे। ‘कम’ किबे ते आथे अउ ‘गो’ किबे ते जाथे। कुकुर किबे ते रिसा जथे अउ ‘टॉमी’ किबे ते घेरी-बेरी पूछी ल हलाथे। संझा-बिहना एला घुमाए बर लेगबे। अउ हां, ये ह जुड़ भात ल नई खाय। ताते-तात ल खाथे अउ दूध-भात खाके टकराहा होगे हे, बुजा के ह।"
जामगांव भर ये खभर ह बगरगे, कि बेलास गंउटिया ह नावा कुकुर बिसाए हे। कांही जिनिस होवय ओहा गांव म सबले पहिली बेलास गउंटिया घर आथे। रेडियो ह घलो सबले पहिली बेलास गउंटिया घर अइस। सइकिल तको ओकरेच घर अइस। टीभी ल घलो बेलास गंउटिया सबले पहिली बिसाइस। गांव भर मा टेक्टर घलो ओकरेच घर लेवइस सबले पहिली। अउ आज एदे गांव म सबले आघू कुकुर पोसे के सनमान घलो बेलास गउंटिया ल मिलगे।
बेलास गउंटिया घर के कुकुर ल देखे बर गांव के कतको मनखे मन ऊंखर घर आवयं अउ कुकुर के बड़ई करके जावत जाएं । कोनो कांहय ‘का मस्त भोकण्ड कुकुर हे जी, बघवा पिला कस दिखथे।’ लइका मन घलो उम्हिागें, बेलास गउंटिया घर के कुकुर ल देखे बर।
बेलास गउंटिया जनम के लुकलुकहा। कुकुर जेखर ‘टामी’ नांव रिहिस, तेला धरिस अउ गली डाहर घूमे बर निकलगे। जाए के पइत बिसवन्तीन ल हुंत करइस- ‘थोकिन देरी मं आहूं। आती खानी टॉमी बर  बिसकुट घलो बिसाहूं।’ बिसवन्तीन अतका मां किहिस- ‘हमर ससुर ल जर धरे हे तइसे लागथे। काली के अब्बड़ खांसत हे। जाके थोकिन देख आवव।’ फेर बेलास गउंटिया नइ सुने के ओखी करिस अउ टॉमी ल धरके घूमे बर चल दिस।
बिसवन्तीन के सास-ससुर, माने बेलास गंउटिया के दाई-ददा मन अलग राहंय। बियारा म एक ठिन कुरिया रिहिस, तेने मां डोकरा-डोकरी दूनो झन राहत रिहिन। ‘कानी गाय के अलग कोठी’ इंकरे अस मन बर केहे गे हें।
डोकरा-डोकरी दूनो झन आज गंडई गे रिहिन डाकटर करा इलाज कराए बर। दूनो झन बस ले उतरिन अउ फइरका ला उघार के भीतरी डाहर खुसरिन। डोकरा ह खांसत खटिया मा बइठिस अउ डोकरी ला किहिस- ‘बेलास के दाई! जावव तो लोटा ल धर लव अउ बहू करा ले दूध लानहूं। मोला आज दूध-भात खाय के सऊंख लागत हे। बड़ दिन होगे दूध भात नइ खाय हाैं।’ हव कहात डोकरी ह लोटा ला धरिस अउ चल दिस बेलास घर। बिसवन्तीन ल आरो दिस- ‘बहू का बूता करत हस वो।’ बिसवन्तीन ह अपन सास ल बइठारिस अउ पूछिस- ‘सब बने-बने हवय नहीं।’ डोकरी बताइस- ‘डोकरा ल दू दिन होगे जर धरे हे। डोकरा काहत रिहिस दूध भात खाहूं कहिके। उही पाय के लोटा ल धरके दूध मांगे बर आए हंव। होही ते दे देतेस?’ अतका म बिसवन्तीन किहिस- 'काला बतांव डोकरी। मेहा तो ये रोगही बिलई के मारे मर गेंव। ते नइ पतियाबे, मंझनिया बेरा रंधनी कुरिया के बेंस ला लगाए बर भूला गेंव अउ नाहे बर चल देंव। आवत ले बिलई ह जम्मो कसेली भर दूध ला पी डरिस। राहत ले नहीं नइ कहितेंव घर बर। डोकरी ह उठिस अउ लोटा ला धरके जुच्छा आगे।
बेलास गउंटिया ल आज तिहार कस लागत हे। मनेमन गदकत हे ओहा । खोर ले किंजर के आइस अउ टॉमी ला अंगना मां बांधिस। बिसवन्तीन पानी दिस त हांत-गोड़ धोइस बेलास गंउटिया ह। बिसवन्तीन कथे- ‘बइठव, मैं जेवन लानत हंव।’ अतका मं गउंटिया किहिस- ‘पहिली टॉमी बर ला। दिन भर के भूखे हे बपरा ह। बिसवन्तीन टॉमी बर कटोरा, भर भात ल पोरसिस। फेर टॉमी कटोरा ल सूंघिस अउ मुंह ल अंते डाहर कर दिस।’ बेलास किहिस- ‘का होगे टॉमी ल ओ! ओतके पइत  बिसकुट ल घलो नइ खइस अउ अभी भात ल घलो नइ खावत हे।’ गउंटिया ला फिकर होगे। थोकिन सोचिस तहान बिसवन्तीन ला किहिस- ‘बिसवन्तीन! टॉमी बर दूध-भात ला। खम्मन बताए रिहिस। टॉमी ह दूध-भात खाके टकराहा होगे हे कहिके। बिसवन्तीन कोटरी म खुसरिस अउ कसेली भर के दूध ला कटोरा मं उलदिस अउ दूध-भात ल टॉमी के आघू मां राख दिस। टॉमी ह दूधभात ल खाए ल सुरू करिस। टॉमी ल दूधभात खावत देखिस ते बलास गउंटिया के जी जुड़इस। बिसवन्तीन घलो टॉमी ल टक लगाके देखत रिहिस। टॉमी ह दूध भात ल उत्ता-धुर्रा खात रिहिस…।’
यशपाल जंघेल
 
                      सहायक शिक्षक
              शासकीय प्राथमिक शाला
                    बैगा साल्हेवारा
          जिला  - राजनांदगांव ( छ.ग. )
                मो. 900991036
3

बने दिन

राजा ह, उछाह म गरजिस,
'बने दिन  अवइय्या हे'

मंत्री मन मुचमुचइस,
'बने दिन  अवइय्या हे'

अधिकारी मन गदकिन,
'बने दिन  अवइय्या हे'

करमचारी मन छटपटइन,
'बने दिन  अवइय्या हे'

जनता ह जोशियाईस,
'बने दिन  अवइय्या हे'

शहेर-नंगर ह चिचियाइस,
'बने दिन  अवइय्या हे'

गोठ ह गाँव के मंगलू कर पँहुचिस,
'बने दिन  अवइय्या हे'

मंगलू ,बुजरुग चैतू ल सोरियाईस,
'बने दिन  अवइय्या हे'

सियान ह सुनिस, गुनिस अऊ बरजिस,
'सबे दिन बने हे ग',
"बने दिन आये नही,लाने जथे"

परछी म ओरमे,धंधाय पिंजरा ले
मिठ्ठू ह ,किररईस
'बने दिन  अवइय्या हे'

              © टीका देशमुख
             तेंदुभाठा (बकरकट्टा)
              जिला- राजनांदगाँव

दरपन कस मनखे

 दरपन कस मनखे
जब तक ले दरपन नई देखही,
मनखे के दिन नई बितत हे ।
कतको बुता रिही संगी,
एक बेर तो दरपन देखत हे ।
इही सेती दरपन ला घलो,
अपन ऊपर गुमान हे ।
मनखे ओला देखें बिना,
एक दिन नई बितात हे ।
फेर ओला कोन बताही,
मनखे ओला नई अपने आप ल देखत हे ।
अउ फोकटे फोकट दरपन हा,
अपन खुबसूरती के दुहाई देवत हे ।
जैसे दरपन तइसे मनखे,
दरपन आघु ले चकचक ले,
अउ पाछु ले खराब हे ।
तइसने मनखे मन घलो हे,
आघु ले तो बने दिखथे,
फेर अंतस भीतरी मा,
कतका जहर भराये हे,
ना कोनो जाने, ना कोनो पहिचाने ।
दरपन अउ मनखे में,
कई चिज समान हे ।
जइसे दरपन अगर टुट गे,
ता मनखे के काम नई आय ।
अउ मनखे के परान छुट गे,
ता दरपन के काम नई आय ।
भला मरे मनखे ला दरपन देखाथे का ?
दरपन के टुटे ले, आवाज बाहिर आथे ।
अउ मनखे के परान छुटे ले,
आंसु बाहिर आथे ।
इही सेती तो कहत हव,
दरपन कस मनखे ।।

✍️ मुकेश साहू
तेंदूभाठा, गंडई, राजनांदगांव
       छत्तीसगढ़

कुंदरा

चन्द्रहास साहू
 
पांच हाथ के लुगरा , चिरहा अऊ मइलाहा जतका छेदा हावय तौन ला पहेनइयां हा नई जाने फेर मनचलहा मरदजात मन जान डारे हावय । उही ला माड़ी के उप्पर ले पहिरे हावय अऊ फुग्गा बाहां वाला पोलखा, पहुंची नरी मा रूपियामाला, भूरी चुंदी तेल फुल के अंकाल, आंखी मा काजर आंजे कजरारी ,कान मा चिकमिक -चिकमिक बजरहा खिनवा, मुड़ी मा डेंकची बोहे, बाहा मा मोटरी अरोये ,मोटरी मा दु झन नान्हे बड़का नोनी ला पाय  भूरी चिकनी उचपुर सुघ्घर गोदना वाली मोटियारी आवय । एक हाथ मा रूंजु के काड़ी ला धरे हावय अऊ छाती मा ओरमत रूंजु ला बजावत राग अलापिस  
भोज नगर के दसमत कइना ं ।
सुंदर हावय घात  ं।।
राजा भोज के बाम्हन बेटी।
कुल बहमनीन के जात ।। 
गुरूर-गुरूर, भुरूर-भुरूर घात सुघ्घर रूंजु हा नरियावय , एक कोती तुमड़ी अऊ बांस ला खुसेर के चार ठन तार ला झीक देहे अऊ बनगे रूंजु ,दु ठन खुटी अऊ खुटी ला जइसे अइठे लागे रूजु हा नरियावय टीनिन-टीनिन टुनुन,टुनून। धरमीन देवारिन हा मंदरस कस मीठ राग अलापथे वइसना रूंजु हा घला गुड़ कस मीठ नरियाथे। ंपारा के जम्मो मइनखे सकला जाथे अऊ धरमीन हा बिधुन होके गाथे अऊ राजा भोज के कहिनी कंतरी कहिथे।
राजा भोज, भोज नगर के राजा रिहिस जेखर सात झन नोनी रिहिस नान्हे नोनी के नांव दसमत आवय जौन हा अब्बड़ सुघ्घर बरन वाली रिहिस । एक दिन राजा हा पुछिस बेटी तुमन काखर किसमत के खाथो ओ। जम्मो बेटी मन राजा के किसमत के खाथन किहिस फेर दसमत किहिस ‘‘ददा मेहां अपन किसमत के खाथो अऊ जम्मो जिनावर घला अपन-अपन किसमत के खाथे ।‘‘ राजा भोज ला खिसियानी लागिस अऊ परछो लेइस । राजकुमारी दसमत कइना के बिहाव उडि़या देवार संग कर दिस । दसमत पुछिस अपन गोसाइया ला 
 ‘‘तुमन का बुता करथो जी, भिनसरहा जाथो अऊ मुधियार ले आथो।‘‘
उडि़या देवार बताइस
न अऊ आनी बानी के खुला देके पठोवय । नानकून दुनो टुरी अऊ धरमीन बर रोटी बासी घला मिले । धरमीन हा एक गांव ले आने गांव इही कहिनी कंतरी ला बताये ला जावय अऊ अपन पेट के आगी ला बुताये । "हमन जोगनी धरे ला जाथन ।"
"कइसे रहिथे जोगनी हा..... महुंं देखहु जोगनी ला ?" दसमत पुछिस मुचकावत  अऊ उडि़या देवार हा किरिया खाइस आने दिन जोगनी ला लानहु । उडि़या देवार हा जोगनी ला लानिस दसमत ला मुचकावत देखाइस  तब दसमत हा ठाढ़ सुखागे। तुमन हा हीरा मोती के बुता करथो अऊ मालिक करा गिस अऊ अपन भाग के जम्मो हीरा ला नंगा लिस आज दसमत कइना अऊ उडि़या देवार हा राजा भोज ले जादा पोठ होगे ।
ये जम्मो कहिनी ला सुनिस तब अब्बड़ उछाह मनावय गांव के मन अऊ धरमीन देवारिन ला चाउर दार नुन तेल ,साग भाजी आमा के अथा
गांव के निकलती मा परिया अऊ परिया मा चार ठन खुटा ला गाडि़या दिस। कमचील ला नवाके झिल्ली -मिल्ली अऊ बांस टाट ला छाइस ओखर उप्पर पेरा ला फेक दिस अऊ बना डारिस अपन बर सुघ्घर ’’कुंदरा ..। तिरषूल वाला मुड़भर के देवता जेखर फुनगी मा लिमउ गोभाये हे , सांकर बाना अऊ बाजू मा झापी, झापी मा फोटो मुरती अऊ आनी बानी के जरी बुटी मंझोत मा पिड़हा कुहकु बंदन पोताये  हे ,अतनी तो कुल देवता आवय जौन ला ओखर गोसाइया हा छोड़ के सरग चल दिस, जेखर पूजा अरचना करथे धरमीन हा । मइनखे हा किरिया खाके दगा देथे फेर लोहा के देवता ,पथरा के भगवान अऊ फोटू मा मुचकावत किशन हा जम्मो उछाह  दुख मा पंदोली देथे , सहारा देथे का चाही येमन ला.........? चुरवा भर पानी गुंगुर -धुप अऊ गुड़ के हुम,नानकुन नरिहर अऊ खोची भर तेल- बाती । जम्मो सियान अऊ लइका के रखवारी करथे इही देवता धामी हा। पाछु कोती नानकून कुरिया अऊ कुरिया मा नान्हे बडे़ ,दरजन अकन सुरा । हबराहा झबलु एक ठन कुकुर कथरी गोदरी, टिन टिप्पी , माली ,थरकुलिया फुटहा कड़ाही अतकी तो जैजात आवए धरमीन के जौन ला अपन संगं संग किजारथे।
कका काकी , भइयां भौजी देवर देरानी जम्मो कोई पांच सात ठन कुंदरा बनाके रहिथे । धरमीन हा गांव कोती ले लहुटिस तब ठाड़ सुखागे जम्मो कुंदरा ला छीही बिहि कर देये रिहिस । टीन -टप्पर ,कथरी गोदरी येती -वेती जम्मो कोती छिदरे- बिदरे  रिहिस। कुंदरा के कमचील ,टाट झिल्ली -मिल्ली बिगरे रिहिस अनर -बनर । सुरा कुरिया घला फुटगे रिहिस अऊ ढेये -ढेये कहिके सुरामन नरियावय । काखर का अनीत कर डारेव भगवान मेहां जेमा मोर कुंदरा ला छति -गति कर डारे हावय परमातमा , का होगे ...? धरमीन गुणे लागिस । जम्मो जिनिस ला सकेले लागिस नान्हे टुरी मन रोये फेर धरमीन हा आंसु ला पी डारे ।
’’ये राड़ी देवारीन, दुसटीन इहा ले भाग नही ते मार डारहू’’ एक झन रेगडू हड़हा बॉस बरोबर उचपुर नानकुन मुहू के मइनखे हा खिसियावत किहिस । मुहू तो नानकुन रिहिस फेर ओखर भाखा अब्बड़ बीख रिहिस।
’’का होगे सरपंच साहेब ,मेहां तो मोर रद्दा मा आथो मोर रद्दा जाथो काखरो लाटा-फांदा मा नई राहव ’’।  धरमिन किहिस
’’वाह रे भकतीन ,गांव गांव गली गली मा चाल चिन्हावत रेंगत हावस अऊ अभी सधवइन बनत हस’’  सरपंच हा धरमीन के गोठ ला सुनके किहिस ।
’’तोर सुरा हा खार खेत ला खुरखुंद मताथे अऊ तेहां गांव ला । अपन मरद ला खाये हस इहां के मरद ला अपन मोहो मा फॉस के वहू ला खाये के उदीम करत हस कलजागरीन’’ सरपंच हफरे लागिस।
’’ये भुइयां ला, ये गांव ला छोड़ के आने गांव जावव। इहां ला झन बिगाड़ो। ये भुइया मा मेहां बियारा बनाहु ,धान अऊ गहू चना मिंजहू’’ सरपंच किहिस ।  
’’दसो बच्छर ले हावन ये जगा मा,नई छोडव। खैरखाडाढ़ के तीर मा रेहेव तब बरदिया हा खेदारिस। ठाकुर दाई तरिया के पार मा रेहेव तब पटईल हा बखानिस अऊ पीपर के छइंया बर कोटवार हा झगरा करिस। कहा जावव नोनी बाबू ला धरके.........? .गरीब के सुते बर चार हाथ के भुंइया घला नई मिले .........वाह रे भगवान... ! मोर मरद नइ हावय तब तेहां मोला कुकुर गत करत  हस,इजत ला बेचत हस’’ धरमीन किहिस ।
’’तोर का इजत रही रे छिनार, अपन मास ला बेचके रोटी मंगइयां’’ सरपंच किट किटावत किहिस ।
’’मोर इही मांस बर तोरो नियत डोलगें रिहिस ,मोर भुइयां मोर माटी झन कह काया हा घला माटी होही । भरे पइसा के गरब झन कर कफन के कपड़ा मा खिसा नई होवय । हाय चीज ,हाय बस,हाय-हाय रपोटो -रपोटो झन कर महल अटारी के रूदबा झन देखा कुंदरा के लइक घला नई होबे सरपंच’’ धरमीन हा रोवत रोवत अतकी तो किहिस।
सरपंच के खेदारे ले काहां जाही बपरी हा ....? ओखर आने लागमनी हा जाये के तियारी करत रिहिस ।
ये सुवारथी समाज मा राड़ी के कोनो इज्जत हे का.........? चील गिधवा कस आंखी ला गडि़याये रहिथे धरमीन उप्पर ,भाग ले दु ठन आंखी हावय जादा आंखी होतिस ते का होतिस ...?.. एक मुडी दु आंखी मा जम्मो टूरी मन बर ,मोटियारी मन बर नियत डोलथे फेर रावण के दस मुड़ी  बीस आंखी रिहिस  ओखर नियत हा सिरिफ एके झन माइलोगिन माता सीता उप्पर डोलिस । ये एक मुड़ी वाला सिरतोन के रावण  आवय कि दस मुड़ी वाला हा  रावण आए .....? कइसे जीयो भगवान मेहां, मोर नोनी हा पढ़ लिख के अगुवाही कहिके इस्कूल मा भरती करे हॅव कइसे पढावव.......? कइसे सहो ताना ला  कइसे बचावव लाज .........? धरमीन हा गुने लागथे।
कहिथे ना एक ठन रद्दा हा मुंदाथे तब आने रद्दा के कपाट  हा उघरथे । धरमीन बर आज श्।ीतला दाई बरोबर बनके आइस दसमत नाव के डोकरी हा , सरपंच के अनीत के भोगना भोगत हावय यहु हा । अपन बियारा के एक ठन कोंटा मा कुंदरा बनाये बर दिस दसमत डोकरी हा। धरमीन अब उही मा रेहे लागे
बेरा हा भुरके उडा़ये लागिस । सरकार के योजना ले सुरा लिखाइस  ओखर बर एक झन चरवाहा लगा दिस धरमीन हा। मास्टर मन हा अब्बड़ पंदोली देवय पढ़ई-लिखई मा जम्मों जिनिस बर। आज बड़की नोनी हा बारवीं किलास ले आगर होगे अऊ नान्हे हा दसवीं ला पढ़े लागिस। उम्मर होइस अऊ सुघ्घर टूरा खोजके बड़की के बिहाव करिस। ददा हा दारू पी-पीके सिरागे रिहिस फेर धरमीन हा आज दाई ददा बनके कन्या दान करिस। एक-एक चुरवा पानी मा गगरी  भर जाथे वइसना एक-एक पइसा सकेले लागिस धरमीन हा। अऊ छोटकी बर टिकली फूंदरी के दुकान खोल दिस। छोटकी हा पढाई मा पातर राहय अऊ दुकानी ला सुध्घ्घर चलाइस। आज गांव मा घर बनाइस  दु कुरिया के सिरमीट के छत वाला।
बड़का अऊ जब्बर रूख हा गरेर मा ढलंग जाथे फेर नान्हे कोवर रूख हा कतको गरेरा आवय जम्मो ला सही लेथे। धरमीन घला जम्मों ला सहीस अऊ जब्बर ठाढे रिहिस। घुरवा के दिन घला बहुरथे वइसना धरमीन के  दिन घला बहुरगे। जांगर खंगे लागिस फेर अपन रूंजु मोटरी अऊ गोदना के जम्मो जिनिस ला धर के जावय। आज गांव के निकलती सरपंच के बियारा कोती ला देखिस तब ठाढ सुखागे, चार ठन बास अऊ कमचील के तनाये कुंदरा बने रिहिस जिहां सरपंच हा टुटहा अऊ दोनगा खटिया मा सूते रिहिस ओखर गोड़ मा घांव, घांव मा  पीप अऊ माछी भिनभिनावत रिहिस। जांगर नई चले अऊ मुहू अब्बड़ चले।
‘‘तोर बोली भाखा मोला लगगे धरमीन ! कुंदरा ले तोला भगाये हंव अऊ उही कुंदरा मा मेहां फेकाये हंव। बहु हा बस्साथे कहिथे , बेटा हा दुतकारथे अऊ नाती हा घिल्लाथे अऊ जम्मो कोई मिलके मोला ये कुंदरा मा फेक दिस। कोनो देखे ला आये, न कोनो  पुछे ला। दु दिन होगे भातबासी घला नई खाये हंव।‘‘
सरपंच रोये लागिस। धरमीन हा झोला ले रोटी के कुटका निकालिस अऊ सरपंच ला खवाइस सरपंच गोबोर-गोबोर खाये लागिस। छिमा मांगिस सरपंच हा अऊ कुंदरा ला ससन भर देखके किहिस
’’मइनखे ला मइनखे बनके रहना चाही धरमीन। महल अटारी के गरब रिहिस मोला सिरतोन कुंदरा के पुरती नई होवय, मोला छिमा कर दे धरमीन ’’सरपंच रोये  लागिस अब गोहार पार के।
 
चन्द्रहास साहू
धमतरी छत्तीसगढ 
मो न 8120578897

पानी

हमन तोर रागी अन, मालिक!
हमर हांत म का हे?
हमन त पानी अन, मालिक!

तंय सावन कहिथस
बरस जाथन,
भोमरा कहिथस
अऊँट जाथन,
नदिया कहिथस
त दऊँड़े लगथन,
तंय बांधा कहिथस
कलेचुप रुक जाथन

सब तोरेच हांत म हे,
हमन त पानी अन, मालिक!

तंय समुंदर कहिथस
खारो हो जाथन,
कुंवा कहिथस
त मीठ हो जाथन,
तंय नल कहिथस
खुल जाथन,
बोतल कहिथस
धंधा जाथन

सरी दुनिया तोर मुठा म हे,
हमन त पानी अन, मालिक!


तंय माटी कहिथस
भंगेल देथन,
पखरा कहिथस
टोर देथन,
तलवार कहिथस
त छाती म झोंक लेथन
तंय बारूद कहिथस
हिरदे म समो लेथन

अपन मुठा ल तंय बांधे राहा,
हमन त पानी अन, मालिक!

                - यशपाल जंघेल
                  सहायक शिक्षक
                   बैगा साल्हेवारा
              जिला - राजनांदगांव(छ. ग.)
             मो. 9009910363

कोलिहा

सिधवा ह, पछुवच रहिगे,
चलउक के मान होगे,
जंगल म अंधरउटी छइस,
त...कोलिहा ह सियान होगे
कोन, काय करही जी..?
जब घुघवा ओकर मितान होगे

आनेच मन हे, मईलाहा-मतलाहा
हमन तो सुघ्घर,फ़रिहर
अइसन...कतका गोहराबे ?
दूसर के दोष देखइ म,
अपनो ह बीरान होगे

जिनगी मिले हे चरदिनिया,
त हांस-गोठिया,
रहि परेम ले अऊ मया बगरा,
फुसकारथस अब्बड़,
कब ले बिकहर जबान होगे ?

रहिथन मिल-जुर के
अऊ रहिबो तको,
नइ करन आन-अपन,
जात- धरम अऊ भगवान के,
तैं कतको चिचिया न जी...
तोर भड़कउनी बर,
हमर भैरा..कान होगे  ||

                 टीका देशमुख
                   सहायक शिक्षक
                 तेंदुभाठा (बकरकट्टा)
                 जिला -राजनांदगाँव

बड़ हुशियार !

रावन मारे  बर बनगे बड़ हुशियार
सजधज के मटमट ले होगे तियार,
काली जेन  हरियर  बेशरम रिहिन
आज  बनगे  बड़  पड़री खुसियार !

नकली रावन ल नकली ह मारत हे
बता तो येला मारे के का अधिकार,
मारना  हे  त  बने  मार न रे अइबी
तोर  अंतस  म घुसरे रावन ल मार !

ले बता  राम के, के ठन गुन हवय
रावन  के गुन  घलो नइ हे दू- चार,
रावन के मुड़ी तो दसे रिहिस होही
तुँहर तो चारो मुड़ा ये हवय हज़ार !

ये कागज़,पैरा भूसा के ल रहन दे
जेन  छेल्ला घुमत हे तेला जोहार ,
जनता के बाँटा ल जेन डकारत हे
अइसन बहुरूपिया ल धर कचार !

इँहा कइ  नकली बाबा,नेता,महंत
येला  सोझिया के ठाढ़ो भुर्री बार ,
अब अइसन रावन ल खोज मारव
तभे ये देश , समाज म होही सुधार !

               -- राजकुमार मसखरे

हिस्सा

 नरेश सक्सेना
 


बह रहे पसीने में जो पानी है वह सूख जाएगा
लेकिन उसमें कुछ नमक भी है
जो बच रहेगा

टपक रहे ख़ून में जो पानी है वह सूख जाएगा
लेकिन उसमें कुछ लोहा भी है
जो बच रहेगा

एक दिन नमक और लोहे की कमी का शिकार
तुम पाओगे ख़ुद को और ढेर सारा
ख़रीद भी लाओगे
लेकिन तब पाओगे कि अरे
हमें तो अब पानी भी रास नहीं आता
तब याद आएगा वह पानी
जो तुम्हारे देखते-देखते नमक और लोहे का
साथ छोड़ गया था

दुनिया के नमक और लोहे में हमारा भी हिस्सा है
तो फिर दुनिया भर में बहते हुए ख़ून और पसीने में
हमारा भी हिस्सा होना चाहिए

रावण को मारना ....

  - संकल्प यदु
        कठिन नहीं था
        रावण को मारना
        राम के लिए
        कभी भी,

        मारने के लिए जरूरी नहीं
        दिव्य पुरुष
        या दुनिया के बाहर का आदमी होना ,

        रावण के पास थे
        दस सिर
        जबकि एक से
        बमुश्किल सम्हलता है

        एक सिर सम्हालना
        याने राम हो जाना ।

                           - संकल्प यदु
                      ' गीतिका' 17/256
                        दाऊचौरा, खैरागढ़
                   मो.नं.- 9589737015
                             8959579847

डॉ रामविलास शर्मा: आलोचना के कुछ बिंदु

अजय चन्द्रवंशी


डॉ रामविलास शर्मा हिंदी के श्रेष्ठ आलोचकों में से एक हैं. आचार्य शुक्ल और द्विवेदी जी के समकक्ष. विषय की विविधता, व्यापकता, परिमाण में उनसे आगे भी. इस दृष्टि से राहुल जी भी उनके आस-पास हैं. यहां तुलना नही है; सभी का अपना अलग महत्व है. केवल परिमाण श्रेष्ठता का मापदंड होता भी नही.मगर रामविलास जी के यहां  परिमाण के साथ व्यापकता और गहराई भी है. एक तरफ भारतेंदु, रामचन्द्र शुक्ल, महावीर प्रसाद द्विवेदी, निराला पर उनका कार्य तो दूसरी तरफ भाषा विज्ञान पर तीन खण्डों में ' भारत की प्राचीन भाषा परिवार और हिंदी'. एक तरफ 'भारत में अंग्रेजी राज और मार्क्सवाद' तो दूसरी ओर ऋग्वेद और दर्शन पर उनके कार्य. इतना वृहद कार्य कठिन अध्यवसाय, समर्पण और प्रतिबद्धता के बिना संभव नही था.बनावटी विद्वता से इतना महत्वपूर्ण कार्य नही किया जा सकता, पोल खुल जाती है.बहुतों की खुलती रही है. यह अकारण नही कि लोग जितना महत्व उनके लेखन को देते हैं, उतना ही उनके व्यक्तित्व को भी. जो उनकी स्थापनाओं से असहमत रहे हैं, वे भी इस मामले में उनका महत्व स्वीकार करते हैं. वैसे उनके समग्र लेखन से कोई असहमत हो ऐसा संभव नही लगता; उनके अलग-अलग स्थापनाओं से अलग-अलग लोगों की असहमति रही है, और उन्होंने इसे दर्ज भी किया है. इन पर उनके जीवन-काल से ही बहस होती रही है.
रामविलास जी के आलोचनात्मक लेखन का प्रारंभ निराला की कविताओं पर लग रहे आक्षेप का जवाब देने से प्रारम्भ हुआ.बाद में देखते हैं कि निराला उनके समग्र लेखन के केंद्र में रहे हैं. वे तुलसी के बाद निराला को ही सबसे बड़े कवि मानते हैं. तुलसी और निराला के काव्यगत विशेषताएं और मूल्य ही मुख्यतः उनके काव्य विवेचना के आधार बनते हैं.नामवर जी ने उचित ही लिखा है "निराला सम्बन्धी व्यवहारिक समीक्षा वस्तुतः डॉ रामविलास शर्मा के साहित्य सिद्धांत का भी दस्तावेज है-किसी भी सैद्धांतिक निबन्ध से अधिक जीवंत और सर्वांग सम्पूर्ण"(केवल जलती मशाल). इस पर मार्क्सवाद के द्वंद्वात्मकता जुड़ जाने से उनकी काव्य दृष्टि का विकास होता है.इस दृष्टि से वे तुलसी और निराला के अंतर्विरोधों को भी रेखांकित करते हैं. मगर वे किसी कवि में बारे में मूल्य निर्णय इस आधार पर देते हैं कि उसके काव्य की मूल प्रवृत्ति किस दिशा में है.यदि वह अपने युग के प्रमुख अंतर्विरोधों पहचानते हुए समाज के विकासमान शक्तियों के तरफ है तो वे कवि के अंतर्विरोधों को कम महत्व देते हैं. इसीलिए वे तुलसी के वर्णधर्म समर्थक उक्तियों को कम महत्व देते हैं. वे साहित्य को सामाजिक-वैचारिक परिवर्तन के लिए जरूरी मानते हैं, इसलिए काव्य में उदात्तता, संघर्षशीलता, आत्म- गौरव का भाव उन्हें पसंद आता है. वे काव्य में कर्महीन विलाप और दीनता को नापसंद करते हैं.यह दृष्टि उन्हें रामचन्द्र शुक्ल जी से जोड़ती है, और यह सर्वविदित है कि वे आलोचना के शुक्ल जी के परंपरा को आगे बढ़ाते हैं.मगर वे हर मामले में उनसे सहमत भी नही हैं. छायावाद पर, भक्तिकाल के उदय पर उनकी असहमति है. शुक्ल जी की लोकवादी दृष्टि जो साहित्य और कला को मनुष्य के जीवन से सम्बद्ध मानती है; उन्हें पसंद आता है.
छायावाद के पक्ष में उन्होंने काफी लिखा है.छायावाद ने जिस तरह रीतिवादी कविता के नायक-नायिका के क्रीड़ा के स्थान पर व्यक्ति के भावों और विचारों को प्रतिष्ठित किया उसका उन्होंने स्वागत किया.छायावाद में जिस हद तक रहस्यवाद से हटकर सामंती मूल्यों से व्यक्ति के मुक्ति की छटपटाहट है उसका उन्होंने समर्थन किया.यही कारण है कि उन्हें पंत जी की अपेक्षा निराला अधिक पसंद आते हैं, क्योकि शुरुआत से ही उनकी कविताएं छायावादी भावबोध का अतिक्रमण करती हैं. वे छायावाद की सीमा पहचानते हैं मगर नामवर जी की तरह उसे 'संतुलन का नाटक' नही मानते.नयी कविता सम्बन्धी विवाद में वे कई बार कहते हैं कि छायावाद के कमजोर पक्ष को छोड़कर उसके सार्थक पक्ष को ही अपनाना चाहिए.
नयी कविता की उनके द्वारा आलोचना का मुख्य कारण उसके व्यक्तिवादी-अस्तित्ववादी प्रभाव ग्रहण कर कविता का प्रगतिशील धारा से दूर हटना था. व्यक्ति के स्वतंत्रता और विशिष्टता के नाम पर जिस तरह कुंठा, निराशा, हताशा, पराजयबोध को कविता का स्वाभाविक विकास और युग का यथार्थ घोषित किया जा रहा था, इस पर उन्होंने तीखे प्रहार किए.लेकिन नयी कविता में इतना ही नही था;इसकी एक दूसरी धारा भी थी जिसके प्रतिनिधि मुक्तिबोध थें.उनकी कविताएं शिल्प के स्तर पर भले पहली धारा के करीब ठहरती है मगर उनकी विषयवस्तु आम-आदमी के जीवन संघर्ष, आत्म-संघर्ष, फासिस्ट शक्तियों के बढ़ते खतरे का अहसास कराने वाली, कुल मिलाकर संघर्षशील जनता के पक्ष में थी. डॉ शर्मा की आलोचना दृष्टि दोनों धाराओं को अलगाये बिना एक समान आलोचना की, जिससे मुक्तिबोध जैसे प्रगतिशील कवि का सही मूल्यांकन नही हो सका.
 भक्तिकाल में जो व्यापक  साहित्यिक जन उभार हुआ उसे उन्होंने 'लोक जागरण' कहा.यह अभूतपूर्व था.देशी भाषाओं को प्रतिष्ठा मिली, साहित्य में जन सरोकार की केन्द्रीयता बढ़ी, समाज के उपेक्षित वर्गों ने अपनी बात मुखरता से कही, सामंती मूल्यों को काफी हद तक चुनौती मिली. इस व्यापक बदलाव का कारण उन्होंने 'व्यापारिक पूंजीवाद' को बताया.यह भी की जाति(नेशन) का निर्माण भी व्यापारिक पूंजीवाद के साथ होता है.उन्होंने व्यापारिक पूंजीवाद की सीमा को भी रेखांकित किया "व्यापारिक पूंजीवाद सदा सामंती खोल के भीतर विकसित होता है इसलिए पुराने सामंती बंधनो से पूरी तरह मुक्त नही होता". भक्तिकाल के अपने अंतर्विरोध भी थें, सगुण-निर्गुण धारा में समानता और भिन्नता दोनों थी.वे समानता पर अधिक जोर देते हैं.
डॉ शर्मा ने परंपरा के मूल्यांकन और भारतीय संदर्भ में मार्क्सवाद पर काफी लिखा है. मार्क्सवाद को लेकर प्रगतिशील आलोचकों से उनकी बहस भी होती रही.उनका मानना था कि अपनी जातीय परम्परा से कट कर साहित्य का विकास नही हो सकता, इसलिए जरूरी है हैं कि परम्परा का मूल्यांकन कर उसके जनपक्षधर मूल्यों को ग्रहण करते हुए आगे बढ़ा जाए. इसका अर्थ परम्परावादी होना नही है, बल्कि परम्परा को आलोचनात्मक निग़ाह से देखना है. वे ख़ुद ऋग्वेद से निराला तक भारतीय साहित्य की पड़ताल करते हुए उसके श्रमवादी और भौतिकवादी मूल्यों को रेखांकित करते हैं. इस क्रम में वे भाववादी मूल्यों का खंडन भी करते हैं, मगर युग की सीमाओं को पहचानते हुए.परम्परा के मूल्यांकन में वे अलग से 'दूसरी परम्परा' पर जोर नही देतें;क्योकि वे जिस श्रमवादी परम्परा की बात करते हैं उसमें 'शुद्र' सहित तमाम शोषित वर्ग समाहित हैं.
वे मानते हैं कि साहित्य और ललित कलाएं उत्पादन के साधनों के बदलने पर तत्काल नही बदल जातीं, न ही उनका सम्बन्ध यांत्रिक रूप से सरलीकृत ढंग से होता है, बल्कि उनका सम्बन्ध जटिल और अपेक्षाकृत दूर का होता है.मार्क्सवाद के द्वंद्वात्मक चिंतन को अपनाते हुए उन्होंने ख़ुद मार्क्सवाद को आलोचनात्मक निग़ाह से देखने पर जोर दिया. उन्होंने लिखा है "मार्क्सवाद हमे सिखाता है हर चीज पर डाउट करो".उन्होंने मार्क्स के गतिहीन एशियाई समाज की अवधारणा से असहमति जताई और यह भी दिखाया कि मार्क्स ख़ुद अंतिम समय मे इस अवधारणा को छोड़ रहे थें.प्रसंगवश इरफ़ान हबीब और रोमिला थापर जैसे मार्क्सवादी इतिहासकार भी मार्क्स के इस स्थापना से असहमत रहे हैं.1857 की क्रांति के संदर्भ में भी उन्होंने मार्क्स की सूचनाओं की अपर्याप्तता को रेखांकित किया.
भाषा विज्ञान पर उनके कार्य का अभी यथेष्ट मूल्यांकन नही हो पाया है; बावजूद इसके जिन थोड़े लोगों ने इस पर लिखा है, इसे महत्वपूर्ण बताया है. वे किशोरीदास वाजपेयी जी के इस स्थापना को आगे बढ़ाते हैं कि हिंदी सहित अन्य भारतीय भाषाओं का स्वतंत्र विकास हुआ है, न कि उनकी उत्पत्त्ति संस्कृत से हुई है.उनमें आदान- प्रदान का सम्बंध अवश्य रहा है. वे संस्कृत-प्राकृत-अपभ्रंश की सीढ़ी को सही नही मानते. भाषा-विज्ञान के अपने अध्ययन में उन्होंने नस्ल के आधार पर भाषा परिवार के विभाजन को अस्वीकार किया तथा सघोष महाप्राण ध्वनि के विश्लेषण के आधार पर इंडो-यूरोपियन भाषा परिवार की भारतीय पृष्टभूमि को रेखांकित किया. उन्होंने दिखाया कि वृहत भारतीय क्षेत्र केवल भाषाओं के आयात का केंद्र नही रहा है, यहां से निर्यात भी हुआ है, मगर उपनिवेशवादी दृष्टि इसे महत्व नही देता. उन्होंने भाषा के आधार पर 'जातियों' के गठन को भी दिखलाया.
उपनिवेशवादी दृष्टि के खण्डन के क्रम में वे अंग्रेजी राज के 'प्रगतिशीलता' को भी प्रश्नांकित करते हैं. उन्होंने दिखाया कि भारत मे अंग्रेजी राज के कायम होने के बाद उसका और ग्रामीणीकरण होता है, देशी उद्योग-धंधे नष्ट होते हैं,जमीदारी प्रथा से किसानों का शोषण बढ़ता है, अकाल बढ़ते हैं, साम्प्रदायिक-भाषायी समस्या बढ़ती है.उनका मानना है कि अंग्रेज न भी आतें तो भारत स्वाभाविक रूप से औद्योगिक-पूंजीवाद के दौर में पहुंचता.साम्राज्यवाद विरोध का डॉ शर्मा के चिंतन में केंद्रीय स्थान है। वे भारतीय समाज के आंतरिक द्वंद्व को स्वीकार करते हैं मगर साम्राज्यवाद के विरोध को प्राथमिक मानते हैं,इसलिए कई जगह जातिवाद के प्रश्नो की तुलना में साम्राज्यवाद विरोध पर अतिरिक्त बल देते हैं और इसके लिए कई मार्क्सवादी लेखकों से भी वैचारिक बहस करते हैं।इसका मतलब यह नही की वे जाति के प्रश्नों से आँख चुराते हैं; उनका समस्त लेखन जातिवाद और पुरोहितवाद के विरोध में है। अवश्य वे समस्याओं का हल 'जाति संघर्ष' में नही वर्ग संघर्ष में देखते हैं।
डॉ शर्मा के चिंतन का ध्येय वैश्विक परिप्रेक्ष्य में  'भारतीय देन' को रेखांकित करना भी रहा है. इसलिए उन्होंने दर्शन, कला, साहित्य, सौंदर्यबोध, में भारतीय परिप्रेक्ष्य को वैश्विक संदर्भ में मूल्यांकित किया और उसे दृढ़ता से रखा. और इस विवेचन में उन्होंने भारत को हमेशा बहुजातीय बहुसांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में उल्लेखित किया.उनका एक और ध्येय हिंदी को समृद्ध करना रहा है, इसलिए उन्होंने अपना लगभग सम्पूर्ण लेखन हिंदी में किया और अपने आखिरी दिनों तक लेखन नही छोड़ा.उन्होंने जितना विस्तृत क्षेत्र  अपने लेखन के लिए सोच रखा था वह एक अकेले व्यक्ति के लिए सम्भव प्रतीत नही होता. कुछ जगह उनके विवेचन में कमी रह जाती है तो इसका एक कारण यह भी लगता है.जो लोग कहते रहें हैं कि डॉ शर्मा इन कार्यों को करने में 'सक्षम' नही थें, उससे ध्वनित होता था कि यह कार्य वे ख़ुद करेंगे अथवा बतायेंगे कि कौन यह कार्य कर सकता है;मगर इतने समय बाद भी उनका 'काम' दिखाई नही देता.बहरहाल अपने तमाम सीमाओं के बावजूद रामविलास जी का कार्य किसी के लिए भी चुनौतीपूर्ण और प्रेणास्पद है, और इस देश की जनता को  अपना भविष्य तय करने के लिए उपयोगी भी.
   कवर्धा(छत्तीसगढ़)

सफल जीवन की राह दिखाती है पुस्तक "साकारात्मक अर्थपूर्ण सूक्तियां"

समीक्षक- गोपेंद्र कु सिन्हा गौतम

     हीरो वाधवानी जी द्वारा संकलित और अयन प्रकाशन महरौली नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित पुस्तक "सकारात्मक अर्थपूर्ण सूक्तियां"मानव जीवन को सफल बनाने की राह दिखाती है।इस पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ में ज्ञान के अथाह बुंदे समुद्र की भांति समावेशित हैं।आप जैसे ही इस पुस्तक के प्रथम पृष्ठ से पढ़ने की शुरुआत करते हैं आप ज्ञान रूपी सागर में गोता लगाने जैसा महसूस करने लगते हैं।इसमें लिखे एक-एक शब्द जिंदगी के मर्म को चरितार्थ करती हुई नजर आती है।सच में अगर इस पुस्तक में संकलित विचार को मानव अपने जीवन में उतार ले तो उसका जीवन मोगरे के फूल की भांति खुशबू बिखेरने लगेगा।
     इस पुस्तक में न सिर्फ मानव जीवन को अर्थपूर्ण बनाने की कोशिश की गई है बल्कि जिंदगी को हर तरह से परिपूर्ण बनाने की ईमानदार प्रयास किया गया है।इसमें मानव के साथ-साथ ब्रह्मांड में पाए जाने वाले प्रत्येक जीव-जंतु,पेड़-पौधे और वस्तुओं के महत्व को दर्शाया गया है। चांद,सूरज,तारे,आकाश,बादल,बूंदे, धरती,समुद्र,पर्वत,पठार, रेगिस्तान,नदियां,कुंआ,तलाब,पेड़-पौधे,घास-फूस,फल-फूल,जीव-जंतु, कीड़े-मकोड़े इत्यादि सभी से कुछ न कुछ ज्ञान अर्जन करने की कोशिश की गई है।साथ ही उनका मानव जीवन को मजबूत बनाने में किस तरह प्रयोग किया जा सकता है उसकी भी राह बताई गई है।
         इस पुस्तक में प्यार-मोहब्बत, इश्क,प्रेम,क्रोध,घृणा,अच्छाई-बुराई,ईर्ष्या-द्वेष,पाप- पुण्य ,हंसी-खुशी दान-दक्षिणा,ऋण,उपकार-तिरस्कार, अलगाव-मैत्री,इच्छा-अनिच्छा, आलस्य इत्यादि जीवन में उत्पन्न प्रत्येक संवेदना को बहुत ही सूक्ष्म तरीके से प्रस्तुत किया गया है। जिसे जान समझ कर मानव जीवन को परिपूर्णता प्राप्त करने में मदद मिलेगा।
   हीरो वाधवानी साहब ने काफी गंभीरता पूर्वक मेहनत,भाग्य,कर्म-धर्म,त्याग,लोभ- लालच,शांति-अशांति,संघर्ष,चेतन- अवचेतन,उचित-अनुचित,स्थिर- गतिशील,सत्य-सत्य,ईश्वर-अनिईश्वर से लेकर इंसान तक की बातें बहुत ही सरल सहज और शुगम तरीके से प्रस्तुत किया है।ताकि इंसान इससे अपने जीवन में सीख ले कर अपनी जिंदगी को सफल बना सके।
इस पुस्तक को हीरो वाधवानी साहब की हिंदी भाषा पर अच्छी पकड़ ने और महत्वपूर्ण बना दिया है।मेरा मानना है इस तरह की पुस्तकें हर घर में होनी चाहिए।ताकि दैनिक जीवन में आने वाली परेशानियों को इसे पढ़कर दूर किया जा सके।


पुस्तक का नाम - सकारात्मक अर्थपूर्ण सूक्तियांक्तियां
लेखक - हीरो वाधवानी
प्रकाशक - अयन प्रकाशन, १/२० महरौली ,नई दिल्ली ११००३०
मूल्य- 300 रूपए

समीक्षक- गोपेंद्र कु सिन्हा गौतम
समाजिक और राजनीतिक चिंतक
औरंगाबाद बिहार
9507341433

 

गुरुवार, 21 अक्तूबर 2021

विश्‍वात्‍मा, कहां हो तुम

कार्तिकेय शुक्‍ला 
 
मैं तो कुछ कहता नहीं
फिर भी मेरी आँखें हैं कहती,
जो कभी मैं देखता नहीं
वे सारी राज़ हैं ये खोलतीय
और कि विश्वास मेरा
कहता है चीत्कार कर ,
हो रही है प्रलय की बेला
बात ये स्वीकार कर।
कि इससे रक्षा करने
रूप नया धर आओ तुम ,
विश्वात्मा हो कहाँ तुम
आओ कि पुनः आओ तुम
रुत ये बदल न जाए
बदल न जाएँ सरगर्मियां ,
मिट न जाएँ हाथों की रेखाएं
मिट न जाएँ कहानियां
और कि इन्हें देने सहारा
मझधार से कोई किनारा
रोज़ टूटती खिड़कियों को
स्वरूप नव दे जाओ तुम।
विश्वात्मा हो कहाँ तुम 
आओ कि पुनः आओ तुम!
घिर रही काली घटाएँ
अंधियारा छाने लगा है,
अपने हिस्से का भी सुख
दूर बहुत जाने लगा है ।
रोक कर अवलम्ब बन
स्वर्ण फूल खिलाओ तुम,
कालिमा इस रात में
मार्ग ज़रा दिखलाओ तुम।
विश्वात्मा हो कहाँ तुम। 
आओ कि पुनः आओ तुम!

मिलोगे जब कभी

रागिनी स्‍वर्णकार ( शर्मा )
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
 
मिलोगे जब कभी मुझ से,बनेगी फिर ग़ज़ल कोई
शरारों की तरह दहकी ,मिलेगी फिर ग़ज़ल कोई
खिली हों गुंचियाँ भँवरे करें मधुमास की बातें
मुहब्बत में कई किस्से, कहेगी फिर ग़ज़ल कोई
 पलाशी गीत  मीठे से,बुनेगा गुलमुहर खिलकर
कली कचनार सी चटकी,लिखेगी फिर ग़ज़ल कोई

 बहारों की तरफ़ देखो, लगे खुशहाल सा मौसमए
गुलाबों की तरह महकी,लगेगी फिर ग़ज़ल कोई
हवायें पायलें पहने, करें छनछन दिशाओं में
फलक पर रौशनी बनके, सजेगी फिर ग़ज़ल कोई

रागिनी स्वर्णकार ( शर्मा )
इंदौर

जीवित हैं सभी सम्भावनायेंं’

डॉ:कामतानाथ सिंह ' कान्हेय ' 
 
 
लो सुनो नेपथ्य से
आती हुई आवाज़,
अभी जीवित हैं
सभी सम्भावनायेंं।
कुछ हवाओं ने कहा
कुछ सर्जनाओं नेए
 मुँह छुपा कर पीठ फेरी
  वर्जनाओं ने,
गर्जनाओं ने दहे
यों पीर के अन्दाज़,
अभी जीवित हैं
सभी संभावनाएं!
फिर उमंगें खोलतीं.सी
 राज़ अपनों के,
कामनायें काटती हैं
कान सपनों केरू
 भावनाओं के पखेरू के
 नये परवाज़,
अभी जीवित हैं
 सभी सम्भावनायेंं।
प्रतिक्रियाएं हो रहीं
 मौसमी चालों पर,
चहलकदमी कर रहीं
यादें रुमालों पर ,
लालिमा लिखती
कपोलों पर नये अलफाज़,
अभी जीवित हैं
सभी सम्भावनायें!

मो 9984210747
सुमन.कुन्ज,  बेवल
सुजवरिया.229307
 रायबरेली,  भारत

इशारों इशारों की जो बात है

प्रदीप कश्यप
 
इशारों इशारों की जो बात है।
वही तो मोहब्बत की शुरूआत है।
ग़मों का समंदर ये जिससे बना।
मेरे आँसुओं की वो बरसात है।
मिला जिंदगी का जो मकसद मुझे।
तेरे प्यार की वो करामात है।
समझ जाओगे दिल की बातें भी तुम।
अभी तो ये पहली मुलाकात है।
नहीं आए इस बार भी कह के वो।
जुदाई भरी फिर कटी रात है।
चलो मुस्कुरा के तो देखा मुझे।
बड़ी आपकी ये इनायात है।
उसे मानकर जीत कश्यप चला।
हुई प्यार में जो मेरी मात है।

रामकिशन शर्मा की रचनाएं

आख़िर उसने भी पीठ पे वार कर दिया
वर्षों के विश्वास को तार तार कर दिया।
नहीं रहा कोई रिश्ता एतबार के काबिल
इस डर ने अब तो खबरदार कर दिया।
खून पसीना बहाके बनाया था आशियाँ
औलाद ने उसी घर से बाहर कर दिया ।
शराफ़त को लोगों ने समझा कमजोरी
छोड़ देने को मुझको मज़बूर कर दिया।
समझता था उनको खैर ख़्वाह अपना
सचाई को पर वक्त ने उजागर कर दिया।
दुनिया बहुत ही बेरहम खुदगर्ज़ है यारो
लोगों के कारनामों ने होशियार कर दिया ।

 

बात यूँ तो सामान्य सी ही की थी उसने
अंदाज़ .ऐ. बयाँ ने दमदार उसे कर दिया।
जुबाँ कैंची की भाँती चलती ही थी उसकी
वक़्त औश्हालात ने और धारदार कर दिया।
अड़ियल था जाता था अड़ असूलों के लिए
सूरत. ऐ. हालत ने पर लचकदार कर दिया।
जाती रही रिश्ते की बची खुची थी जो शर्म
लड़ाई को जबसे उसने आर पार कर दिया ।
सच के हक़ में बोला पर्दा झूठ का जो खोला
साफगोई ने कइयों का गुनहगार कर दिया ।
जिंदगी तो चेताती रही मौत है मंजिल तेरी
अहंकारी इंसां ने लेकिन दरकिनार कर दिया।
मौत सिरहाने जब आ खड़ी तब सकपकाया  
क्यों यूँ खूबसूरत जिंदगी को बेकार कर दिया

तान्या सिंह की दो गजलें


तान्‍या सिंह
बहुत लोग बारिश के आते हुए
रो लेते हैं आँखें बिछाते हुए

थकन इतनी है ज़िन्दगी से उसे
है मायूसी ज़िन्दा बताते  हुए

बहुत चोट लगती है आवाज़ को
दिवारों में रस्ता बनाते हुए

मेरा दिल नहीं लग रहा जीने में
तेरा साथ झूठा निभाते हुए

मज़ा लेना ही पड़ता है जख़्म का
दवा शायरी को बनाते हुए

तेरी बद्दुआ का असर इतना है
मुझे डर है पौधा लगाते हुए

2

जब भी हयात आब को बिसयार देती है
माँ की दुआ इलाह को ललकार देती है

रुलाये ख़्वाब भी ना कोई उसके बच्चे को
जब माँ सुलाती है तो वोए थुथकार देती है

पल भर में भूल जाता है वो अपने दर्द को
माँ देख कर यूँ बच्चे को पुचकार देती है

बेरोज़गारी तो यूँ ही बदनाम फिरती है
फिलहाल रोजगार भी अफ़कार देती है

कुर्सी के आस.पास अगर पहुँचे अर्ज़ियाँ
तो मेज पे दबा भी ये सरकार देती है

तान्या सिंह
गोरखपुर,
उत्तर.प्रदेश

मंगलवार, 19 अक्तूबर 2021

दिल का हर एतिबार झूठा है।

 ग़ज़ल

दिल का हर एतिबार झूठा है।
बेवफ़ा तेरा प्यार झूठा है।
वो शराफत से पेश आएगा।
मन का ये भी विचार झूठा है।
बात उसकी न सच समझना तुम।
दोस्त वो बार- बार झूठा है।
साजिशें पाल कर रखीं दिल में।
प्यार का ये खुमार झूठा है।
आँसुओं को छिपा रखा भीतर।
मुस्कुराता वो यार झूठा है।
लौटकर आएगा नहीं वो फिर।
तेरा भी इंतिजार झूठा है।
दर्द कश्यप बहुत दिया उसने।
कौन कहता है खार झूठा है।
****
रचनाकार
प्रदीप कश्यप

आत्मा आहत हुई

★वीरेन्द्र खरे 'अकेला'

आत्मा आहत हुई तो शब्द बाग़ी हो गए।
कहते कहते हम ग़ज़ल दुष्यंत त्यागी हो गए।
है सियासत कोठरी काजल की रखना एहतियात,
अच्छे-अच्छे लोग इसमें जा के दाग़ी हो गए।
गेह-त्यागन और यह सन्यास धारण सब फ़रेब,
ज़िन्दगी से हारने वाले विरागी हो गए।
गालियाँ बकते रहे जिनको उन्हीं के सामने,
क्या हुआ ऐसा कि श्रीमन पायलागी हो गए।
आप जिन कामों को करके हो गए पुण्यात्मा,
हम उन्हीं को करके क्यों पापों के भागी हो गए।

जब भी खुदा मेरे तस्सवुर में आते हैं

जब भी खुदा मेरे तस्सवुर में आते हैं ।
दिल-दिमाग मेरे बाग-बाग हो जाते हैं।।
खुदा की इबादत में खो जाने वालों को ।
फ़रिश्ते भी खुद ग़ैब से नेअमतें दे जाते हैं ।।
ऐसा लगने लगता है कई बार जहन में ।
उनके नूर से खुदबा खुद अंधेरे छंट जाते हैं ।।
नफ़रतों को कभी न, दिल मे पालने वाले।
खुशियों से ऐसे लोग मालामाल हो जाते हैं ।।
उलझने खुदबा खुद उनकी सुलझ जाती है ।
जो तनाव से सदा कोसों दूर हो जाते हैं।।
हर फैसला जो खुदा की रज़ा पर छोड़ दे ।
ऐसे इंसान जिंदगी मे कभी दुख नही पाते हैं।।
रिश्ते भी खुदा की नेअमतों में शुमार होते हैं।
ये खुशी-ग़म में इक दूजै का साथ निभाते हैं।।
खुदा की बन्दगी में ही सब कुछ है लोगों ।
"नाचीज"तो उसी के आगे ही सर झुकाते हैं।।
*******
मईनुदीन कोहरी
मोहल्ला कोहरियांन, बीकानेर
मो -9680868028

मेरी पलकें भिगोना चाहता है

मेरी पलकें भिगोना चाहता है
मेरा दिल खूब रोना चाहता है
बहुत नाराज़ है गुज़रे दिनो से
न जाने किसका होना चाहता है
मैं बहलाऊ इसे एक बार फिर से
ये बच्चा तो खिलोना चाहता है
उसे कोई खबर करदो के उसका
दिवाना खुद को खोना चाहता है
ज़फ़ा के दौर मे शायद ये नादा
वफ़ा का बीज बोना चाहता है
ज़हन को आरज़ू है कोठियों की
बदन तो इक बिछोना चाहता है
जगाया रात भर फुर्क़त ने जिसको
वो आशिक़ दिन मे सोना चाहता है
वो बूढ़ा बाप जो मालिक है घर का
वो घर में एक कोना चाहता है
... अनवर क़ुरैशी

मेरी नज़र की धूप तो पहुंची किसी तरह

बरसों की जमी बर्फ तो पिघली किसी तरह
मुमकिन नहीं था खोलना अपनी ज़बान का
नज़रों से दिल की बात तो पहुंची किसी तरह
आने से उनके रूह को राहत हुई नसीब
मुश्किल से दिल में जान तो आयी किसी तरह
मिलने का उनसे शौक़ सताता है रात दिन
गर्दिश हमारे सर से ये टलती किसी तरह
आती न याद उनके सहारों की आज भी
लग्जिश हमारी हमसे संभलती किसी तरह
लहरों का तकाज़ा है किनारे पे रहें हम
कश्ती हमारी पार उतरती किसी तरह
उनकी हयात हमने संवारी है हां मगर
अपनी ये ज़िंदगी भी संवरती किसी तरह
महेंद्र राठौर जांजगीर

एक तुलसी आंगन में.

डॉ. शिल्पी समद्दार ‘सदाबहार’

बेटी का सम्मान भी हर घर में 
माता तुलसी की ही तरह हो। 
जिस तरह तुलसी बिना आंगन सुना है 
उसी तरह बेटी बिना आंगन सुना है ।
बेटी बचाओ बेटी बचाओ
मत छेड़ो नारी शक्ति को।
धरती माँ करे पुकार,
मुझ से ही है वसुंधरा।
हर कली की सदा बहार।
बेटी बचाओ बेटी बचाओ
तुलसी का एक पेड
लगाओ । आंगन को खूब महकाओ । 
तुलसी और बेटी की तुलना न करो, 
दोनों का ही करो सम्मान ।
हर घर मे सुख बेटी की पाओ।
दुख में छाव का पाओगे सुक का अनुभव।
बेटी बचाओ बेटी बचाओ।
अगर छेड़ोगे बेटी हमारी
जीवन नरक बन जायेगी रेगिस्तान ।
हरियाली को तुम तरसोगे।
बेटी बचाओ बेटी बचाओ
आसमान में घनघोर धूँआ
कितना प्रदूषण चारों ओर।
बिन पेड़ों के सांस रुक जाए । 
पेड़ लगाओ पेड़ बचाओ।
बेटी बिना सुना आंगन
सुकून ना मीले। जीवन में।
भूखे नंगे भटकोगे कल
अपनी करनी का फल।
भुगतोगे।
सारे जग अभी ना चेते।
जीवन तबाह जब कर लेगे।
हर आंगन मे एक तुलसी
ओर हर घर मे एक बेटी
स्वस्थ पवन खुशहाली जीवन।
बेटी बचाओ बेटी बचाओ
सम्बंध, अनुठान वृक्ष वर्षा का ।
लगाओ वृक्ष अनमोल जीवन।
प्रकृति का है अद्भुत खेल,
पेड़ों से ही है वर्षा का देख मेल।
एक तुलसी प्रकृति की देन दे रहा है सब संदेश,
पेड़ बचाओ बेटी बचाओ
सदा मुस्कुराओ बहारो का शान।
[ डॉ. शिल्पी समद्दार ‘सदाबहार’,अंतरराष्ट्रीय बंगाली समाज़ की फाउंडर हैं. समाजसेवी डॉ. शिल्पी जी दुर्ग छत्तीसगढ़ से हैं. ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ में डॉ. शिल्पी जी की पहली रचना प्रस्तुत है, कैसी लगी लिखें. - संपादक- कवियित्री सम्पर्क- 94255 62712 ]

मेहमान

संजय सहरिया

लन्च का काम निपटाकर अनुभा बेडरूम में कमर सीधी करने आ गयी थी.वॉशरूम में चेहरा धोकर बिस्तर पर आई ही थी कि मोबाइल की घण्टी बज उठी थी.
"रघु का फोन वो भी इस समय!"....स्क्रीन पर उभरते नम्बर को देख मन ही मन सोचते हुए उसने जल्दी से फोन उठाया.
"अनु यार एक गड़बड़ हो गई है."
पति रघु की आवाज में काफी बेचैनी झलक रही थी.
"गड़बड़ी ....कैसी गड़बड़ी हो गयी है?आप साफ साफ बोलिए न.मन घबरा रहा है मेरा."
"अनु दरअसल कम्पनी के नए वाईस प्रेजिडेंट को मैंने आज बातों बातों में घर पर डिनर के लिए सपरिवार इनवाइट किया और वो तुरन्त तैयार भी हो गए."
"अरे ये तो खुशी की बात है..आप ने बेवजह डरा ही दिया था.चलो तो फिर मैं करती हूं रात के खाने की तैयारी."कहते हुए अनुभा मुस्कुरा रही थी.
"अनु अनु अनु ....तुम्हे बात की गम्भीरता समझ नही आ रही है. ये कोई तुम्हारे मायके धर्मगढ़ से तुम्हारे चाचा या मामा नही है बल्कि मेरे बॉस है और देश की जानी मानी कम्पनी के वाईस प्रेजिडेंट.उनकी पत्नी नामचीन बैंकर है और दोनो लड़कियां नीदरलैंड में इंजीनियरिंग कर रही है.सारा परिवार वेस्टर्न कल्चर में पला बढ़ा है.उनके उठने बैठने का तरीका, खाने पीने और बातचीत का अंदाज बेहद स्टाइलिश है." रघु के स्वर में तनाव साफ दिख रहा था.
अनु ने वेसे तो इतिहास में एम ए किया हुआ था पर वो शुद्ध देहाती माहौल में पली बढ़ी थी. पिता और भाई खेती बाड़ी से जुड़े थे.अंग्रेजी में बाते करना या फिर कांटे चम्मच से खाने का अंदाज उसे बिल्कुल नहीं पता था.पहनावे में शादी से पहले सलवार कमीज और शादी के बाद साड़ी पहनना ही घर की पंरपरा रही थी.
रघु के परेशान होने का कारण तो अनुभा को समझ आ गया था पर खुद उसे मेहमानों के स्वागत में कोई कठिनाई नही दिख रही थी.
"आप बिल्कुल चिंता मत करो.बस मैं किचन के कुछ सामान की लिस्ट आपको भेज देती हूं आप आते समय लेते आना.अब जब उन्होंने आने का बोल दिया है तो स्वागत तो करना ही है."
अनु ने रघु के तनाव को कम करने का प्रयास किया था.
फोन रखने के बाद भी रघु उन पलों की कल्पना कर कांप जा रहा था जब इतने ऊंचे लोग उसके घर मे होंगे और अनुभा जैसों महिला देशी तरीको से उनका स्वागत करेगी.
पर तीर कमान से निकल चुका था.रघु ऑफिस से जल्दी निकल गया था ताकि अनु के मंगवाए सामान लेकर जल्द घर पहुंच जाए.
सामान लेते समय भी रघु के दिमाग मे क़ई तरह की आशंका चल रही थी.दिमाग मे चल रहे उहा पोह के कारण लौटते समय उसने अपनी गाड़ी गलत रोड पर ले ली थी.नतीजन उसे काफी लंबा यू टर्न लेना पड़ा .ट्रैफिक और गलत रास्ता पकड़ लेने की वजह से रघु को घर लौटने में घण्टा भर ज्यादा लग गया था.
घर पहुंचते ही कॉम्पोउंड में बॉस की मर्सडीज देख तो वो दिसम्बर की ठंड में पसीने पसीने हो गया था.
घबराते हूए अंदर आया तो हॉल में कोई नही था.चाय के बस खाली कप पड़े थे.पर किचन से बातचीत का शोर जरूर आ रहा था.
रघु जल्दी से किचन के पास पहुंचा तो जो कुछ उसने देखा वो उसे एक ख्वाब सा लग रहा था.
बॉस का पूरा परिवार अनुभा के साथ डिनर की तैयारी में लगा हुआ था.एक स्टोव पर भिंडी फ्राई हो रही थी तो दूसरे पर पुड़िया छन रही थी. आलू मटर की सब्जी बनकर तैयार थी.बड़ी बेटी मिक्सी में धनिया पत्ती की चटनी पीस रही थी तो बॉस खुद प्याज काट रहे थे.सबसे बड़ी बात थी कि सभी सारा काम बड़े आनन्द लेकर कर रहे थे.
अनुभा बड़ी सहजता के साथ सबको बताती जा रही थी कि किसमे कितना मसाला डालना है, भिंडी कितनी देर फ्राई करनी है अदरख कहाँ रखा है और काला नमक किस डब्बे में है.
रघु का शरीर और दिमाग जैसे पाषाण हो गया था.
"सर आप ये क्या कर रहे है? यहां तो काफी गर्मी है.आप सब हाल में बैठिए हमदोनो सब कर लेंगे." रघु बॉस के हाथों से प्याज काटने वाला चाकू लेते हुए गिड़गिड़ा रहा था.
"नही नही रघु आज हम ये अवसर नहीं जाने देंगे.जाने कितने सालों बाद आज कॉलेज लाइफ में खुद बनाकर खाने वाली जिंदगी को फिर जी रहे है हमलोग."
"हर जगह डिनर या लन्च में हम दुनिया भर की भारी भरकम औपचारिकताओं के बीच फंस कर रह जाते है पर तुम्हारी पत्नी की व्यवहारिकता से आज का डिनर स्पेशल हो गया है.दुसरो की तरह दिखावे से अलग तुम्हारी अनु का आत्म विश्वास और मेहमानों के स्वागत का देशी अंदाज लाजवाब है."
बॉस की पत्नी ने अनु की तारीफ करते हुए कहा तो रघु अंदर से थोड़ा सामान्य हुआ था.
"भिंडी,बैंगन और दाल जैसे लजीज व्यंजन आजकल कहाँ कोई परोसता है.एक ही तरह के उबाऊ कॉन्टिनेंटल फूड खाते खाते एकदम बोर हो चुके थे हम सब."
बॉस की दोनो बेटियां भी बेहद खुश होकर बताने लगी थी.
"रघु महिलाओं को किचन संभालने दो और हमदोनो चलो हॉल में एक चादर बिछा लेते है .आज तो चादर पर बैठकर डिनर करेंगे हमसब."
एक के बाद एक आते सरप्राइज ने रघु को दंग कर दिया था.
पर रघु आज अनु को लेकर कितना गौरवांवित हो रहा था. वो गांव की साधारण देहाती महिला समझ कर जिसकी उपेक्षा करता रहा था उस अनु ने इतने बड़े कॉरपोरेट परिवार के वेस्टर्न स्टाइल में खुद घिरने की बजाय सभी को अपने देशी अंदाज में ढाल लिया था.

सहरिया
संजय सहरिया
मुम्बई(महाराष्ट्र)

मदद

रेखा


"अरे मैंम क्या आप मेरा ये फार्म भर देंगी।"शगुन ने पीछे मुड़कर देखा तो पीछे एक लगभग बीस वर्षीय युवती खडी थी।

"क्या बात है? तुम खुद क्यों नहीं भर लेती।"
" जी मुझे फार्म भरना नहीं आता,पढी लिखी नहीं हूँ ना।"
शगुन ने ऊपर से नीचे तक युवती को ध्यान से देखा। वह युवती अपने पहनावे से बिल्कुल भी अनपढ़ नहीं लग रही थी। युवती ने शगुन की आँखो में प्रश्न देख लिया था।
"जी मैं घर घर जाकर खाना बनाने का काम करती हूँ,परसों मेरा एक जानकार देस जा रहा है सोच रही थी कि घर उसके हाथ कुछ पैसे भिजवा दूँ बस इसलिये........।"
"लाओ दो फार्म भर देती हूँ।"
अभी शगुन ने फार्म पकडा था के एक बुजुर्ग महिला ने शगुन से पूछा," बिटिया आपके पास फोन है मुझे बेटे से बात करनी है कहते हुए उसने एक कागज की परची शगुन की तरफ बढाई। उस पर शायद उसके बेटे का फोन नंबर लिखा था। शगुन ने ना में सिर हिलाया और बताया कि वो अपना फोन घर भूल आई है। तभी शगुन को याद आया के उसके साथ खडी़ युवती के पास फोन देखा था ।
"एक मिनट अम्मा जी...."
"आपके पास फोन है ना बेटा.....जरा अम्मा जी की बात करा दो उनके बेटे से।"
"वो मैंड़म जी हमारे आदमी ने मना किया किसी अंजान को अपना फोन देने को।"
"अरे बेटे वो आपका फोन लेकर भाग थोडे़ जायेगी।आप नंबर मिला दीजिये...वो दो मिनट बात कर लेंगी।"
"ना मैंडम जी ....किसी अंजान...."
"हम दोनो एक दूसरे को जानते हैं ?"
" नहीं"
"मैं आपका काम कर रही हूँ ना।"
"पर मैंड़म जी"
"पर क्या...बेटा अगर सब आपकी तरह सोचने लगें तो कोई भी किसी की मदद नहीं करेगा। आप की मदद भी नहीं करेगा कोई। तो बेटा अगर हम किसी से मदद चाहते हैं तो पहले मदद करना सीखें।अब अगर मैं ये फार्म ना भरूँ तो आपको अच्छा नहीं लगेगा,है ना ?"
"लाईये अम्मा जी नंबर दीजिये।"
अम्मा जी ने दो मिनट बात की और फिर आशीष देती वहाँ से चली गई। फार्म भी भरा जा चुका था। शगुन चलने को हुई तो पीछे से आवाज आई "थैंक्यू मैंड़म जी, फार्म भरने के लिये और.....मदद और वो अम्मा जी कितने आशीष दे कर गई। मुझे बहुत अच्छा लगा।"
उसकी बात सुन शगुन मुसुकुराई।
युवती भी मुसकुराई। शगुन ने महसूस किया कि
बैंक परिसर में अच्छाई मुसकुरा रही थी।

हिस्से का दूध

उनींदी आँखों को मलती हुई वह अपने पति के करीब आकर बैठ गई। वह दीवार का सहारा लिए बीड़ी के कश ले रहा था।

"सो गया मुन्ना...?"
“जी! लो दूध पी लो।” सिल्वर का पुराना गिलास उसने बढ़ाया।
‘“नहीं, मुन्ना के लिए रख दो। उठेगा तो...।" वह गिलास को माप रहा था।
“मैं उसे अपना दूध पिला दूँगी।" वह आश्वस्त थी।
"पगली, बीड़ी के ऊपर चाय-दूध नहीं पीते। तू पी ले।" उसने बहाना बनाकर दूध को उसके और करीब कर दिया।
तभी-
बाहर से हवा के साथ एक स्वर उसके कानों से टकराया। उसकी आँखें कुर्ते की खाली जेब में घुस गईं।
"सुनो, जरा चाय रख देना।"
पत्नी से कहते हुए उसका गला बैठ गया।

छिपकली

श्‍वेता


मैं पंद्रह वर्ष की थी जब मैंने सिटी बस से कोचिंग जाना शुरू किया था। पंद्रह वर्ष, जब ज़िंदगी से लड़कपन जा सा रहा था और प्रतियोगी परीक्षाएँ पास नहीं तो ज़्यादा दूर भी नहीं थीं। पापा ने कहा था कि इस साल कोचिंग रहने दो। अगले साल से तो जाना था ही! और मैंने ज़िद की कि मेरे लिए स्कूटी ख़रीदने की जगह कोचिंग की फ़ीस भर दें। और खुद से ये ज़िद की कि घर पे कभी नहीं जताऊँगी अपनी परेशानी।

लाल सफ़ेद सलवार कुर्ते में लम्बे बालों की एक चोटी बनाए, चश्मे से झांकती आँखें किताब में गड़ाए अपने छोटे से शहर में मैं अकेली नहीं थी जो सपने देख रही थी। जब आप मध्यमवर्गीय, पारम्परिक परिवार से हों, तो लीक से हट कर सपने देखना इतना आसान नहीं होता। लेकिन ज़िद आसान काम करने की नहीं होती। और दादी की सुनें, तो ज़िद्दी तो मैं अपने बाप से भी ज़्यादा थी।

जोधपुर की गर्मी की दोपहर के बारे में कुछ भी रूमानी नहीं है।
एक ऐसी ही दोपहर ठसाठस भरी बस में मैं स्कूल के बाद कोचिंग के लिए जा रही थी। रातानाडा से पावटा का आधे घंटे का सफ़र पसीना पोंछते, कोहनी मार के जगह बनाते, अचानक से लगे ब्रेक पे खुद को सम्भालते ख़त्म हो गया होता अगर वो सब नहीं हुआ होता। बैठने की जगह इस समय कभी नहीं मिलती थी, और आज तो खड़े होने में भी दिक़्क़त थी। एक तरफ़ न्यू गवर्न्मेंट स्कूल के लड़के खड़े थे। अपनी पूरी अक़्ल लगा के मैं दूसरी तरफ़ खड़ी हुई जहां एक आंटी थोक में ख़रीदे कपड़ों की गाँठें लिए खड़ी थीं।
थोड़ी देर में आंटी के कपड़ों की गाँठें मेरे कुछ ज़्यादा ही पास आ गयीं। मैंने ध्यान नहीं दिया। पर ये ध्यान ना देना काम नहीं आया क्यूँकि अब ना सिर्फ़ वो गाँठे बड़ी होते हुए मेरी कमर तक पहुँचने लगीं, उनका बोझ भी बढ़ने लगा। कुछ बहुत अजीब सा था। मैं अचानक से अपने शरीर को ले कर सजग हो गयी। मुड़ के देखा तो आंटी को सीट मिल गयी थी और उनकी जगह एक ४५-५० साल के अंकल खड़े थे।
जितना मुमकिन था, उतनी दूर हट गई मैं। पर थोड़ी ही देर में एक बोझ पीछे से मेरे शरीर को निगलता सा जा रहा था।
मैं कोई छुइमुई लजीली लड़की नहीं थी। अपने स्कूल की प्रीफ़ेक्ट थी, डिबेट में सबके छक्के छुड़ा सकती थी और स्पोर्ट्स में तो लड़कों के कान काटती थी। लेकिन मैं जम गयी। गला सूख गया और पैर नौ मन के हो गए। पीठ पे अब छिपकली सी रेंग रही थी। ना जाने कितना समय निकल गया ऐसे। अंत में हिम्मत जुटा के रुँधे गले से बस इतना निकला कि, अंकल आपकी बेटी की उमर की हूँ मैं!
‘अंकल’ ने कहा “हमारी बेटियाँ ऐसे खुली बाहर नहीं फिरतीं!”
मैं पंद्रह साल की कोचिंग जाती ‘खुली’ बच्ची थी। उस दिन फिर मैं नहीं जा पाई क्लास। घर आके एक घंटा लगा था मुझे वो घिनौना अहसास खुद पे से धोने में। वो बदबू आज तक नहीं गयी। अपनी ज़िद में कभी ये बात किसी को बताई नहीं मैंने। उसके बाद पचासों बार ऐसा हुआ, लेकिन मैं तैयार थी। दिल्ली की बसों से लेकर न्यूयॉर्क के सबवे तक। हर जगह ऐसे अंकल मिले, और हर बार मेरी ज़िद जीत गयी। पर पहली बार की ज़िल्लत, घिन, और वो लिजलिजा अहसास आज तक नहीं गया है। आज भी कभी कभी सपने में मेरे पैर मेरा साथ नहीं देते और मैं जम जाती हूँ वहाँ जहां से मुझे भाग जाना चाहिए। आवाज़ नहीं निकलती मेरी जब मुझे चिल्लाना चाहिए।
ये तो बहुत छोटी बात थी ना? इसके बाद तो बहुत कुछ हुआ। कभी किसी अजनबी को तो कभी किसी बहुत करीबी को लगा कि मेरे शरीर पे उसका मुझसे ज़्यादा हक़ है। तो फिर क्यूँ मुझे वो पीठ पर रेंगती छिपकली आज भी सताती है?
क्या इसलिए कि जब मैं जवाब ढूँढ रही थी, वो अंकल मुझपे तोहमत लगा के निकल लिए अपनी बेटियों को चारदीवारी में क़ैद कर उनकी सुरक्षा करने। या इसलिए कि उसके बाद हर बार की घटना में घुम फिर के उसी की पुनरावर्ती होती रही।
और जब इतने साल नहीं बोला ये सब किसी को तो आज क्यूँ ये कहानी सुना रही हूँ?
आज मेरी दस साल की भतीजी की आँखों में वो डर दिखा है। ये छिपकली रक्तबीजा है! अठारह सालों में ये मुझसे ना हटी, और अब नन्ही की पीठ पे पसर रही है। सीख तो वो भी जाएगी बच के चलना। समय के साथ ये डर आँखों का लावा भी बन जाएगा। पर क्या कोई भी आँच, कोई भी ज़िद इस छिपकली की लिजलिज़ाहट ख़त्म कर पाएगी?

दो कविताएं - गोपाल कौशल

शरद पूर्णिमा* 

शरद पूर्णिमा  पर बनती
अमृत सुधा से भरी खीर ।
सेवन करें जो दमा रोगी
दूर होय उसकी सब पीर ।।

स्वस्थ रहें  हमारा  शरीर
बनें  हम  सुधीर - अधीर ।
हम दे जग में  यह संदेश
चंद्र जैसा रखें स्वच्छ शरीर ।।
 
बहें चहुंओर शीतल समीर
मिटे  द्वेष  भाव  का   क्षीर ।
सद्भाव से महक जाएं वतन
शरद चंद्र बरसाएं ऐसा नीर ।।

        ✍ गोपाल कौशल
        नागदा जिला धार म.प्र.
          9981467300




     महर्षि वाल्मीकि जी
÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷÷

संस्कृत भाषा  के  आदि  कवि
रामायण रचकर पाई जग छवि ।
कश्यप ऋषि-माता चर्षणी पुत्र 
रत्नाकर से बने वाल्मीकि ऋषि।।

महर्षि नारद से मिला ऐसा ज्ञान
लूटपाट का मार्ग छोड़,जपा राम ।
समझाया जग को राम चरितार्थ 
जीवन होय सफल जपे जो नाम ।।

बिरले ही मिलते है ऐसे तपस्वी
जिसे नमन करता गगन से रवि।
दीमक  घर बन  गया तप स्थल
इसी नाम से प्रसिद्ध हुए वाल्मीकि ।।

जपे राम नाम छोड़े प्रवृत्ति दानवी
बनें हम भी वाल्मीकि जैसे तपस्वी ।
राम नाम ही सत्य है जान लें सभी
करें यही शुभकामना गोपाल कवि ।।

            गोपाल कौशल 
     नागदा जिला धार मध्यप्रदेश
           99814-67300
     रोज एक -नई कविता -1629
     ©कॉपीराइट ®  05-10-17

रविवार, 17 अक्तूबर 2021

लोक कथाओं के चरित्र और क्षेत्र की विशेषताओं का वर्णन करते हुए स्थानों के नाम

श्रीधर पाण्डेय शोधार्थी प्रस्तावना – यदि हम अपने क्षेत्र के गाँव या मुहल्लों का अवलोकन करते हैं तो यह पाते हैं कि उनका नाम या तो अति प्राचीन है या मध्ययुगीन या फिर आधुनिक पर नामों को ध्यान देने से पता चलता है कि यह यूं ही नहीं पड़ गया है, इनके पीछे या तो एक कहानी है या कोई स्पष्ट तर्क है।जैसे यदि नाम प्राचीन या अति प्राचीन है तो जरूर ही उसके पीछे कोई लोक कथा या इतिहास जुड़ा हुआ है। पर यदि वह नाम मध्ययुगीन या आधुनिक है तो उसके पीछे क्षेत्र की विशेषता या पहचान छुपी हुई है। जैसे कि उदाहरण के लिए कुछ मुहल्लों का नाम देखते हैं राऊतपारा, तुर्करीपारा, सतनामीपारा,बख्शीमार्ग, तेलीगली आदि ये सभी नाम जातिगत आधार पर पड़े हैं। वहीं नए पुराने बस्ती के आधार पर नवापारा, पुरानापारा आदि नाम रख दिये गए हैं ये तो हुआ मोहल्लों का नाम जिसके साथ एक विशेषता जुड़ी हुई है। इसी प्रकार स्थानों के नाम उस क्षेत्र में संपादित होने वाले कामों के आधार पर भी रख दिये जाते हैं जैसे कि बजारचौक, गौठानचौक आदि तो कुछ का नाम लोगों के सम्मान के लिए रख दिया जाता है जैसे कि गौठियाचौक, कर्माचौक आदि इस प्रकार नाम और उसके अर्थ के पीछे एक लम्बी कहानी देखी जा सकती है।

स्थान का नाम और उसका लोक कथाओं के चरित्रों में वर्णन – कुछ स्थानों के नाम ऐसा देखा गया है कि उसका स्पष्ट रूप से वर्णन हमारी लोक कथाओं एवं लोक गाथाओं व आख्यानों में पाया जाता है। इस क्रम मे हम सर्वप्रथम खैरागढ़ के पास कवर्धा रोड पर स्थित एक जगह को देखते हैं जिसका नाम है ढिमरिन कुआं । यहाँ का नाम ढिमरिन कुआं ऐसे ही नहीं पड़ गया है इसके नाम के पीछे समाज में अनेक मान्यताएँ और कहानियाँ प्रचलित हैं। जिसमें से एक कथा कुछ इस प्रकार है कहते हैं कि यहाँ एक कुआं स्थित था जिसकी स्वामिनी एक मछुआरिन थी जो रूप और सौन्दर्य में साक्षात अप्सरा मेनका थी वह वहाँ से गुजरने वाले थके और प्यासे राहगीरों को अपने रूप जाल में फंसाकर उनका शोषण करती थी जिसके चलते उसका कुआं ही एक लैंडमार्क बन गया था। यह एक अफवाह भी हो सकती है परन्तु इसके साथ ही हमें डॉ विजय चौरसिया कि लिखी पुस्तक गोंडवाना कि लोककथाएँ प्राप्त होती है जिसमें एक कहानी है लोमड़ी और कुत्ता इस कहानी में भी सनबरसा नाम का एक युवक एक ढिमरिन के जाल में फंसा होता है और उसकी माँ उसे उसके चंगुल से मुक्त करवाती है । इसी क्रम में बईहा टोला और भरतपुर जैसे जगहों का नाम आता है जहाँ लोग भरतपुर को रामायण काल के राम के भाई भरत से जोड़कर देखते हैं तो वहीं बईहा टोला के लिए अनेकों कहावतें व धारणायें प्रचलित हैं कुछ लोग कहते हैं कि यहाँ के ज़्यादातर लोगों की हरकतें ऐसी थी की लोग उन्हे पागल कहते थे तो वहीं कुछ का मानना है कि यहाँ के लोग जरूरत से ज्यादा शान्त और सीधे थे जिसे आम बोलचाल में लोग बईहा ही बोल देते हैं जो छत्तीसगढ़ी के अतिरिक्त अन्य बोलियों में भी देखा जा सकता है। जैसे कि अवधी में भी सीधे स्वभाव के लोगों को बउरहा कह दिया जाता है। इस प्रकार कई अन्य स्थानों के नाम के अर्थ सीधे लोक कथाओं और धारणाओं से संबन्धित हैं ।

स्थानों के नाम और उस क्षेत्र कि विशेषता – कई स्थानों के नाम उस क्षेत्र की विशेषता का वर्णन करते नजर आते हैं जिसके लिए मैंने खैरागढ़ के ही चारों तरफ के गाँव को आधार बनाया तो अमलीपारा, अमलीडीह और अमलीपारा कलाँ ऐसे गाँव हैं जो खैरागढ़ को लगभग चारों ओर से घेरे हुये हैं । अब एक जैसे नाम का क्या अर्थ निकल सकता है । इस प्रश्न पर विचार करने पर ये पता चलता है की ये ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ पूर्व में बड़े पैमाने पर इमली का उत्पादन किया जाता था और साथ ही साथ इसका व्यवसाय भी किया जाता था जैसा की गाँव के नाम के पीछे जो सिद्धान्त काम करते हैं उसमें यह पता चलता है की गाँव का निकास या बार्डर क्षेत्र के किसी जगह को डीह घोषित किया जाता है और उसे पर करने का तात्पर्य होता है गाँव से बाहर होना जिसे सामान्य बोलचाल की भाषा मे डीह डाकना भी कहा जाता है । तो जाहिर होता है की अमलीडीह का नाम किसी इमली के पेड़ या उत्पाद के कारण ही अमलीडीह रख दिया गया होगा । और अमलीपारा कलाँ का नाम स्थानों के नाम रखने की पुरानी विधि जब एक नाम के दो क्षेत्र बनाते थे तो उसे कलाँ या खुर्द जोड़कर अलग करते थे का अनुसरण करते हुये बना होगा जाहिर है की इस सम्पूर्ण क्षेत्र मे इमली से जुड़े कारोबार होने के कारण ही इसका नाम ऐसा पड़ा होगा। इस क्रम में एक और नाम देखते हैं बढ़ईटोला क्या आप को नहीं लगता है की यह इलाका जरूर ही बढ़ईगीरी में निपुण लोगों का रहा होगा जिसके कारण इसका नाम ऐसा पड़ा होगा जैसे की यह पूरा शोध पत्र प्राथमिक डाटा और स्रोतों से प्राप्त सामाग्री से प्राप्त जानकारी पर आधारित है इसलिए इसका बहुत ज्यादा संदर्भ तो नहीं दिया जा सकता है परन्तु यह एक पहल है यदि इस विषय पर विस्तृत तौर पर शोधकार्य किया जाता है तो वह निश्चित रूप से संदर्भ सामाग्री बनेगी जिसके आधार पर भविष्य में ज्ञान की परम्परा आगे बढ़ेगी।

निष्कर्ष – इस शोध कार्य व पत्र का संक्षिप्त निष्कर्ष यह कह सकते हैं कि यदि स्थानों के नामों के अर्थ पर विचार किया जाय और उसे थोड़ा कुरेदा जाय तो निश्चित रूप से उसका एक अर्थ मिलेगा जिसका संबंध या तो किसी लोक कथा या धारणा से होगा या फिर वह नाम उसके क्षेत्र में पूर्व या वर्तमान में संपादित होने वाले किसी काम विशेष से जरूर संबन्धित होगा इसका अध्ययन करके इसे दस्तावेजीकरण करने की आवश्यकता है जिसे आने वाले समय और पीढ़ी के लिए सुरक्षित रखा जा सके । 

सन्दर्भ-

1.  चौरसिया, डॉ विजय, गोंडवाना कि लोककथाएँ, राजकमल प्रकाशन, दिल्ली

2.  उपाध्याय, डॉ कृष्णदेव, लोक साहित्य की भूमिका, साहित्य भवन प्रा. लि., इलाहाबाद 

थियेटर विभाग ,इन्दिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़  

 मो. 8368072446          ई-मेल- shreeconnect.2013@gmail.com