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रविवार, 26 नवंबर 2023

क्या शहरों को रेगिस्तान बना देने का वक्त आ गया ?

 

आलमी जंग के मुहाने पर फिर से इंसान आ गया
ऐटमी जंग नज़दीक, क्या क़यामती वक्त आ गया ?
तरबियत और तरक़्क़ी के सफ़र में सदियाँ लगीं थीं

Mahavir Singh

क्या शहरों को रेगिस्तान बना देने का वक्त आ गया ?
अपने पड़ोसी को माल-ए-ग़नीमत कभी मत समझो
नफ़रत की किताबें को जलाने आज का वक्त आ गया
जन्नत की शराब शहद हुर्रें पाने काजी को पहले भेजो
झूठे ख़्वाबों से आप के जाग जागने का वक्त आ गया
ग़ैर मोमिन वाजिब क़त्ल, आलिम तो नहीं कह सकता
फ़र्ज़ी फ़तवों को तुरंत नकारने का अब वक्त आ गया
हिंदुओं, यहूदियों से हुनरमंदी सीख लेने में अक्लमंदी है
सिनेगॉग, मस्जिद में अमन करार होने का वक्त आ गया
मंदिर गिरजा मस्जिद वालों, इल्म का तक़ाज़ा समझो
जाहिलियत को छोड़ दो, इंसानियत का वक्त आ गया
अपने अपने तरीक़े से पूजा प्रार्थना इबादत वाजिब हैं
मज़हब के नाम पर, खूं-रेजी रोकने का वक्त आ गया
तारीख़ गवाह है, मासूम और बेक़सूर ही पहले मरते हैं
जुल्मों से ग़ुरबत ही बढ़ेगी, समझने का वक्त आ गया
हजारों सालों की मेहनत बाद लोग चांद तक पहुँचे हैं
मंगल से आगे सफ़र करने का मंगलमय वक्त आ गया
सब के लिये ‘एक नूर’ ने ही, सब्ज बाग जमीन बनाई है
शांति-दूतों में गांधीवादी नबी के आने का वक्त आ गया
मोदी जी ने पुतिन से कहा था, ये सदी जंगों की नहीं है
जहां में फिर शांति फैलाने हेतु, भारत का वक्त आ गया
आलमी जंग के मुहाने पर फिर से इंसान आ गया
ऐटमी जंग नज़दीक, क्या क़यामती वक्त आ गया ?
………. स्व रचित

शनिवार, 25 नवंबर 2023

कालूराम पथिक जी का एक नवगीत

वागर्थ।
हम उदासी से भरे बादल!
हमारा क्या!!
भीड़ कोलाहल शहर में
बिजलियों का डर!
है खुले आकाश के नीचे हमारा घर!!
घुल गया है जंगली पन
आदमीयत में!
दर्द की जागीर पाई है
वसीयत में!
है बरसती आंख के काजल!
हमारा क्या!!
रोटियों में ही अभी तक
ज़िन्दगी उलझी!
लोग सुलझाते रहे
गुत्थी नहीं सुलझी!!
अब असर बाकी कहां
होगा दवाओं में!
घोल आए हैं जहर
जाकर हवाओं में!!
मौत के नजदीक आते पल!
हमारा क्या!!
हम उदासी से भरे बादल!
तुम्हारा क्या!!

जय चक्रवर्ती नवगीत,

जय चक्रवर्ती 

【1】
|| पाखण्ड की सत्ता ||
---------------------------
क्या लिखा ! अब
ये, न पूछो सिर्फ-
लिखने के लिए हम लिख रहे हैं ।
रीढ़ की हड्डी रखी
दरबार में
गिरवी हमारी
हर जगह गिरकर
उठाने में
कटी है उम्र-सारी
आस्था से
अस्मिता तक
जी करे जिसका- खरीदे,
हम समूचे बिक रहे हैं ।
पक्ष कोई भी न अपना
दृष्टि में
पैबस्त भ्रम हैं
इधर भी हैं , उधर भी हैं
दरअसल-
हम पेण्डुलम हैं
गिरगिटों के
वंशधर हम,
सिर्फ़ दिखने के लिए ही
आदमी-से दिख रहे हैं ।
शीर्ष पर पाखण्ड
की सत्ता हमें
खलती नहीं है
आग सीने में हमारे
अब कभी
जलती नहीं है
पाश, नागार्जुन,
निराला और
कबिरा के लिखे पर
पोत हम कालिख रहे हैं ।
••
【2】
|| इतना बुरा न था ||
-------------------------
वक़्त बुरा पहले
भी था, पर !
इतना बुरा न था ।
आसमान का
षड्यंत्रों से
गहरा नाता है
धरती के
दुःख पर सूरज
कहकहे लगाता है
ऊँचाई का अर्थ
हमेशा-
इतना गिरा न था ।
धर्मों की कारा में
बंदी -
शब्द प्रार्थना के
गूँज रहे हैं
मंत्र परस्पर
कुटिल-कामना के
प्रेम - प्यार का
राग कभी-
इतना बेसुरा न था ।
मसनद जिनकी है
मजलूमों के
कंकालों पर
जड़े उन्होंने
कदम-कदम
प्रतिबंध सवालों पर
सिंहासन का शीश
कभी, इतना
सिरफिरा न था ।
••

एक वर्षा गीत

बादलों से फिर उतर आई ,
परी बरसात की ।
दूर झीलों में नहाईं ,
सुंदरी बरसात की ।
फिर बताशी फूल बूँदों के ,
खिले हैं डार पर ,
फिर बजी मुरली हवा की ,
साल वन में रात भर ,
फिर निचोड़ी पर्वतों ने ,
चूनरी बरसात की ।
मेघदूतों ने सुनाई ,
यक्ष की पीड़ा व्यथा ,
यक्षणी की आँख से बहती ,
उदासी की कथा ,
बेख़बर नचती रही है ,
किन्नरी बरसात की ।
छा गयी है फिर धरा के ,
कर्ण -फूलों की महक ,
गंध- गुच्छों को निहारा ,
तितलियों ने एक टक ,
फिर लजाई झौंपड़ी में ,
गूजरी बरसात की ।
कमलेश श्रीवास्तव ।
094250 84542

गुरुवार, 18 अगस्त 2022

लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की नवगीत

 

        हमें सद्प्रयास करना होगा
लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव
 
इत्र से महके बदन, तो वह समझ लो बेकार है,
सदचरित्र से जीए जीवन से, महकता संसार है।
इत्र की खुशबू, बस! कुछ घड़ी में खत्म हो जाती,
सद्कर्मों से बदल सकता, समाज व परिवार है।।

परिवार और समाज बदलने से, होती है प्रगति,
हमारे विचारों में परिवर्तन की, आती ख़ूब गति।
अच्छे विचारों से महकने लगता, हमारा जीवन,
हम सद्प्रयास करते रहें, आगे जैसी हो नियति।।

हमारे सद्प्रयासों को, भाग्य भी देता है संबल,
जीवन में असंभव कार्य भी, हो सकते हैं हल।
सद्प्रयासों में प्रायः मुश्किलों से, होता सामना,
हाथ की रेखाएँ भी बदल जाती, जो हैं अटल।।

जीवन में कभी कभी सद्प्रयास, नहीं होते सफल,
हम अपने को कभी न अकेला माने, न ही निर्बल।
अकेले गाँधी जी ने, आज़ादी के लिए बढ़ाए पाँव,
फिर पूरा देश उनके साथ, कदम मिला दिया चल।।

हम अपने जीवन में सद्प्रयास को, कभी न छोड़ें,
जो जीने के तय किए सिद्धांत, उसे कभी न तोड़ें।
कभी सफलता, कभी विफलताओं का होगा दौर,
विजय मिले, उन कोशिशों को अपनी ओर मोड़ें।।


               आदर्श बने हमारा परिवार 

कुछ ऐसा करने की कोशिश, आदर्श बने हमारा परिवार,
संस्कृति, सभ्यता हम सीखें, खूब मिलें अच्छे संस्कार।
धन-दौलत भले ही कम हो, सद्गुण, विवेक अनंत मिले,
अनुजों को स्नेह खूब दें, बड़ों का करें आदर-सत्कार।।

परस्पर सहयोग भावना, परिवार के प्रति हो समर्पण,
जब पड़े जरुरत तो तन मन धन से सर्वस्व करें अर्पण।
परिवार में इक-दूजे के, सुख-दुःख का हम रखें ख्याल,
हम समझें मन की बातें, खुशियों का बनें हम दर्पण।।

मात-पिता और बड़ों के, अनुभव का हम लाभ उठाएँ,
अपनी खुशियों के लिए, उन्हें हम वृद्धाश्रम न पंहुचाएँ।
जन्म दिया और पालन-पोषण कर, हमें योग्य बनाया,
कोशिश हो उनकी आँखों में, आजीवन आँसू न आएँ।।

छोटी-छोटी बातों के लिए, हम कदापि न करें तकरार,
छोटों और बड़ों के प्रति सदैव, हमारा हो मृदु व्यवहार।
विचारों में कभी भिन्नता हो, रिश्तों में न लाएँ खटास,
त्रुटि कभी किसी से हो जाए, कम न होने पाए प्यार।।

जब होगा सामंजस्य, परिवार की होगी इक पहचान,
देखने से आँखों में हो हर्ष, हम दें इक-दूजे को सम्मान।
परिवार में न होगा दुर्भाव, न होगा कभी यूँ मनमुटाव,
खुशियों का होगा आगमन, परिवार की बढ़ेगी शान ।।

छल, कपट या ईर्ष्या न हो, समस्याओं पर करें विमर्श,
परिजन करते जब प्रगति, ह्रदय में होता असीम हर्ष।
मत भिन्नता होने पर आपस में मिल-जुलकर दूर करें,
दूर तक फैलेगी यश-कीर्ति, परिवार का होगा उत्कर्ष।। 

                   राष्ट्र हित हो सर्वोपरि

राष्ट्र हित की बात हो, निज स्वार्थ को करें परित्याग,
एकजुटता को दिखाकर देश प्रेम का गाएँ हम राग।
धर्म भाषा जाति मज़हब को तब गौण कर दीजिए,
हमारे सीने में जलनी चाहिए, राष्ट्र प्रेम की आग।।

राष्ट्र हित के लिए देशभक्तों ने, प्राण बलिदान किए,
देश की आजादी के लिए, परिवार वीरों ने तज दिए।
सीने पर खाई गोलियाँ व हँस कर फाँसी पर लटके,
घास की रोटी खाएँ, देश के आन बान शान के लिए।।

देश हित में ऋषि दधीचि ने किया अस्थियों का दान,
गांधी जी तन मन धन लगाए, देश का हो कल्याण।
सुभाषचंद्र बोस ने जीवन देश को समर्पित कर दिया,
भगतसिंह आजाद जैसे रणबांकुरों ने लगाई जान।।

देश की प्रगति व खुशहाली का सदा हम रखें खयाल,
अमन चैन सर्वत्र विराजे, कोई न भूखा, न रहे कंगाल।
समरसता, सद्भावना और एक दूजे के लिए सम्मान,
सुख-शांति से सब जीवन जिए, हम भी रहे खुशहाल।।

देश व समाज हित के लिए हृदय में में आए सुविचार,
कटुता और वैमनस्यता का हम कभी न करें व्यवहार।
देश हित में, परिवार हित हो सके तो, हम गौड़ कर दें,
सभी से हम रखें प्रेम मोहब्बत, न हो किसी से तकरार।।


ग्राम-कैतहा, पोस्ट-भवानीपुर
जिला-बस्ती 272124 (उ. प्र.)
मोबाइल 7355309428

बुधवार, 19 जनवरी 2022

इजारबंद गाँठ लगातें हैं

विमल सागर
 
आ जाओ छांव के दामन में
बैठ गीत नया एक लिख देतें हैं
रिश्ते के मनका-मनका लरज़ते
अब गाँठ रिश्तों इजारबंद दे लेतें हैं....

गिले शिकवें दिलों में जितने हों
तिलांजलि उन्हें दे आज लेतें हैं
बसंत ऋतु बसंतराज आ रहे
नव कोंपल बन फिर जीतें हैं.....

महक उठे फिर से यह रिश्ता
दोनों दिल धड़कन बन लेतें हैं
पलकों की ढलती शाम फिर हो
नयनों के जाम पी लेतें हैं.....

पकड़ो दोनों के छोर वहीं
उधड़न तुरपन कर लेतें‌ हैं
तन दिखे न किसी रिश्तों का
देह बसन सिल लेतें हैं...

इत्र लगा देना तुम साँसों का
फिर से महक दिल में होगी
हम बैठ वहीं फिर एक दूजे से
बात कोई फिर मुलाकात होगी....

प्रीत का रंग पड़ गया फीका
फिर बहार बसंत ले आतें हैं
छांव के दामन बैठ लो फिर से
हम गीत नया लिख लेतें हैं।।
 
उत्तर प्रदेश

शुक्रवार, 31 दिसंबर 2021

तीन नवगीत

डॉ मृदुल शर्मा

  1.

दिन कटे
नैराश्य-भय से लड़खड़ाते।

रात-दिन थे कैद घर में
सिर झुकाये।
भूत भय का
अभय हो आंखें दिखाये।

कर्म-सैंधव 
देह  में थे छटपटाते।।

हो रहा था
काल का अनवरत तांडव।
गीत गूंगे हो गये थे
मौन कलरव।

पास आते
स्वजन भी थे थरथराते।।

मुश्किलों के पांव
अब पीछे मुड़े हैं।
फिर पखेरू जीत के,
नभ में उड़े हैं।

आ गये दिन फिर
हंसी से खनखनाते।।

       2.


किसे खबर थी,
ऐसे दिन भी आएंगे।।

स्वर गूंजेंगे,
मै-मेरा, तू-तेरा के।
सुबह-शाम
संबंधों के होंगे फांके।

मुर्दे खुद ही, 
अपना बोझ उठायेंगे।।
किसे खबर थी,
ऐसे दिन भी आएंगे।।

जाति-धर्म के बाड़ों में
रहना होगा।
देख हवा के रुख को ही
बहना होगा।

राम-कृष्ण तक
बाड़ों में बंट जाएंगे।।
किसे खबर थी,
ऐसे दिन भी आएंगे।।

सूरज की किरणें 
गोदामों में होंगी।
सत्य-न्याय की
ध्वजा उठायेंगे ढोंगी।

बलिदानों को
हाट दिखाये  जाएंगे।
किसे खबर थी,
ऐसे  दिन भी आएंगे।।

      3.

पंछी यहां गीत मत गाना।।

तुम हो बियाबान के वासी।
इस बस्ती के लिए प्रवासी।
ठकुरसुहाती को कहने में,
अगर हो गयी चूक जरा सी।

बहुत पड़ेगा फिर पछताना।।
पंछी यहां गीत मत गाना।।

यहां व्यवस्था घुटनों चलती।
खादी है जनता को छलती।
पैसों की खातिर खाकी भी,
कठपुतली की तरह मचलती।

रीति यहां की है बिक जाना।।
पंछी यहां गीत मत गाना।।

जोड़-जुगाड़ अगर कर पाओ।
तो फिर तुम भी मौज उड़ाओ।
इसमें अगर नहीं हो माहिर,
तो प्राणों की खैर मनाओ।

कौन काट दे कब परवाना।।
पंछी यहां गीत मत गाना।।

569क/108/2, स्नेह नगर,
आलमबाग, लखनऊ-226005
मो.9956846197

परिचय - जन्म -01-05-1952, शिक्षा-एम.ए., पीएच.डी. ,  गद्य-पद्य की तेईस पुस्तकें प्रकाशित। दो कृतिया उ.प्र.हिंदी संस्थान और तीन कृतियां अन्य साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत। विगत चार दशकों में शताधिक पत्र-पत्रिकाओं में पांच सौ से अधिक रचनाएं प्रकाशित। उ.प्र.हिंदी संस्थान  द्वारा साहित्य भूषण सम्मान,         
वर्तमान में छंद बद्ध कविता की त्रैमासिक पत्रिका "चेतना स्रोत"का अवैतनिक संपादन ।

मौलिक, स्वरचित, अप्रकाशित  नवगीत
प्रकाशनार्थ प्रेषित।


गुरुवार, 16 दिसंबर 2021

रक्तिम अधरों के पंकज उर

संतोष कुमार श्रीवास
 
रक्तिम अधरों के पंकज उर,मृदु सुमन सुवासित होते हैं।
मरंद के झरते हैं निर्झर,मधुकर लालायित होते हैं।।
नित सजल नेह की सरिता मे।
मृदु कुमुद नीड़ की कविता मे।
उस छंद बद्ध की ड़गर सुघड़।
मन सुमन सुवासित होते हैं।
रक्तिम अधरों के पंकज उर,मृदु सुमन सुवासित होते हैं।
मरंद के झरते हैं निर्झर,मधुकर लालायित होते हैं।।
करुणा की केशर क्यारी मे।
अरुणिमा अधर फुलवारी मे।
उरतल की निश्छल गात महा।
हृद् मुकुर आह्लादित होते हैं।
रक्तिम अधरों के पंकज उर,मृदु सुमन सुवासित होते हैं।
मरंद के झरते हैं निर्झर,मधुकर लालायित होते हैं।।
नयनों की शीतल छाया मे।
आंसु की गहनतम माया मे।
पलकों की निर्मल कुंज मृदुल।
नित नेह सुभाषित होते हैं।
रक्तिम अधरों के पंकज उर,मृदु सुमन सुवासित होते हैं।
मरंद के झरते हैं निर्झर,मधुकर लालायित होते हैं।।
नित-नित चरणों के पावन रज।
मुकलित,प्रमुदित,रक्तिम नीरज।
लालायित नयनन की आभा।
अश्रु सिंधु समाहित होते हैं।
रक्तिम अधरों के पंकज उर,मृदु सुमन सुवासित होते हैं।
मरंद के झरते हैं निर्झर,मधुकर लालायित होते हैं।।


कोरबा (छत्तीसगढ़)

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2021

नवगीत : मृदुल शर्मा

 

नवगीत

        (1)

किसे खबर थी,
ऐसे दिन भी आएंगे।।

स्वर गूंजेंगे,
मै-मेरा, तू-तेरा के।
सुबह-शाम
संबंधों के होंगे फांके।

मुर्दे खुद ही, 
अपना बोझ उठायेंगे।।
किसे खबर थी,
ऐसे दिन भी आएंगे।।

जाति-धर्म के बाड़ों में
रहना होगा।
देख हवा के रुख को ही
बहना होगा।

राम-कृष्ण तक
बाड़ों में बंट जाएंगे।।
किसे खबर थी,
ऐसे दिन भी आएंगे।।

सूरज की किरणें 
गोदामों में होंगी।
सत्य-न्याय की
ध्वजा उठायेंगे ढोंगी।

बलिदानों को
हाट दिखाये  जाएंगे।
किसे खबर थी,
ऐसे  दिन भी आएंगे।।

        (2)

दिन कटे
नैराश्य-भय से लड़खड़ाते।

रात-दिन थे कैद घर में
सिर झुकाये।
भूत भय का
अभय हो आंखें दिखाये।

कर्म-सैंधव 
देह  में थे छटपटाते।।

हो रहा था
काल का अनवरत तांडव।
गीत गूंगे हो गये थे
मौन कलरव।

पास आते
स्वजन भी थे थरथराते।।

मुश्किलों के पांव
अब पीछे मुड़े हैं।
फिर पखेरू जीत के,
नभ में उड़े हैं।

आ गये दिन फिर
हंसी से खनखनाते।।

       (3)



मनमोहक, मादक,
मंजु, मुखर,
क्या कहने-
शरद-पूर्णिमा के।।

कण-कण में
फैला है उजास।
नभ से भू तक
मृदु चन्द्र-हास।
फूला न समाता
हरसिंगार,
है लुटा रहा
अविरल सुवास।

लावण्य धरा का
अनुपमेय,
दृग-कमल खोल
पोखर ताके।।
क्या कहने-
शरद-पूर्णिमा के।।

नभ-नील-स्वच्छ
अतिशय सुन्दर।
पीयूष झर रहा है
झर-झर।
चर-अचर मुग्ध
सौन्दर्य देख,
हो गई
समय की गति मंथर।

यामिनी
लजाती द्युति रति की,
गहनों में
शुभ्र ज्योत्स्ना के।।
क्या कहने-
शरद-पूर्णिमा के।।

        (4)

तोड़ निराशा के घेरे को
सुखिया दुख में भी हंसती है।।

चौका-बर्तन, झाड़ू-पोछा,
कई घरों के वह पकड़े है।
हाड़-तोड़ मेहनत करती पर,
दरिद्रता फिर भी जकड़े है।

उतर गले के नीचे पति के,
दारू रोज उसे डसती है।।
सुखिया दुख में भी हंसती है।।

राम, कृष्ण,शिव का सुमिरन कर,
रोज निकलती अपने घर से।
नहीं परिश्रम से डर लगता,
पर डरती है बुरी नज़र से।

नहीं बोल पाती मुंह से पर,
दांत भींच, मुट्ठी कसती है।
सुखिया दुख में भी हंसती है।।

सन्तति के उज्ज्वल भविष्य के,
सपने सुखिया पाल रही है।
नहीं संभलती देह मगर,
पूरा परिवार संभाल रही है।

बहुत सुखद सपनों की बस्ती,
उसकी आंखों में बसती है।।
सुखिया दुख में भी हंसती है।।

मो.9956846197


सोमवार, 30 मार्च 2020

हैं चल रही

हैं चल रही
हवाओं के
बुलंद हौसले।
हो रही है तबाही
आया सैलाब।
बिखरे हैं मनका से
हारिल से ख्वाब।।
सुख पखेरू
से उड़े
घायल हैं घोंसले।
सिमटे हुए कछुआ से
खोल में लोग।
समाज में फैला है
पैसों का रोग।।
देखते ही बनते
आदमी के
चोंचले।
अविनाश ब्यौहार
जबलपुर म.प्र.

कितने औपचारिक हैं हम

डॉ सुशील शर्मा

कितने औपचारिक
हो गए हम।
अहं कुहासा
घेरे हरदम
आत्मीय रिश्ते अब हैं सपने।
सब औपचारिक हो गए अपने।
बदली जीवन की परिभाषा।
अंदर घुटती मन अभिलाषा।
फिर भी जीते जाने क्यों हम।
साँझ के वो झिलमिल अंधियारे।
गाँव के वो प्यारे गलियारे।
वो पड़ोस का प्रिय अपनापन
अपनी मिटटी का वो सोंधापन
सोच सोच कर आँखे होती नम।
जब से मैं इस शहर में आया
खुद को भी मैं लगूँ पराया।
जटिल कलुष से भरे हुए मन।
हर पल शंकित बीते जीवन।
नहीं मित्र कोई न हमदम।
घूम रहे सब हाथ ले खंजर।
चारों तरफ घृणा के मंजर।
मुख पर अपनापन के चित्र।
अंतस घृणा भरी विचित्र।
दीप बुझाता दिखता तम।
पर्वत जैसी है ख़ामोशी
शब्दों पर छाई मदहोशी
नेह के शीशे दरक रहें हैं।
रिश्ते नीचे सरक रहें हैं।
दो मुँह के व्यवहार रखें हम।

रविवार, 12 जनवरी 2020

रामकिशोर दाहिया के छः नवगीत

【1】
।। नये आंकड़े ।।
---------------------
भूख-गरीबी
ओढ़े-दासे
थके रोटियां खोज।
उन्नति के
सरकार दिखाती
नये आंकड़े रोज़।

आदिम जाति
दलित की पीड़ा
ऊपर गई उठाई।
विकसित हो
कल्याण खोज में
नयी योजना आई।

बुझे-बुझाये
चेहरे दिखते
नहीं दीखता ओज।

नियम और
उपनियम बनाकर
खुद का मतबल साधें।
चतुराई से
भीड़ तंत्र में
निबलों को आराधें।

ऊपर से
नीचे तक केवल
चले जुगाड़ी भोज।

जैकों पर
जो लोग टिके थे
लुढ़क रहे सब नीचे।
जिनके नाम
नहीं वो बैठे
लेकर नियम गलीचे।

पकड़ाधरी
दिखाने को ही
धांधे गये फिरोज।।
            ◆◆

  【2】
।। चलो खंगालें ।।
-----------------------
भाई को भी
भाई समझें
चारा ठीक नहीं 
ऊंच-नीच
कुत्सा का
चलना
आरा ठीक नहीं 

 दशकों की
आजादी को सब
करते गौर रहे 
आरक्षण था
नाम जाति के
खाते और रहे 

देख आइना
ऊपर चढ़ता
पारा ठीक नहीं

जाति वर्ण की
संख्या देखें
किनमें लोग उठे
दफ्तर-दफ्तर
नजरें डालें
कितने कौन कुटे

जीवन कहीं
मौत को देती
धारा ठीक नहीं 

जातिवाद के
फुग्गे पिचकें
ज्यादा तने हुए 
छानें बिना
पसीना रबड़ी
दादा बने हुए 

गाढ़ कमाई
वंदन पर
दोधारा ठीक नहीं 

बहुजन रोधी
जंग छेड़ दी
घर-घर आग लगी 
बीच हमारे
मानवता भी
सुबके देख ठगी 

चाह गहन
वर्चस्व नीर का
खारा ठीक नहीं 

चलो खंगाले
दफ्तर-दफ्तर
सर्वे कर डालें 

बैठे उच्च
पदों पर देखें
शंका क्या पालें

गैर बराबर
शिक्षा, वैभव
सारा ठीक नहीं
          ◆◆

     【3】
।। शेष बचा है ।।
---------------------
झटके सह
पाखंड-झूठ के
बैठे नहीं
कभी चुप रहके
बनते हूमन
नहीं हवन के
तब तो
गाते गीत अमन के।

उनके
चाल-चलन
उत्पाती
कोंख दबाए
काबा-काशी
क्या!
उम्मीद करें
हम उनसे
जिनकी नजरें
बुद्ध विनाशी

भाव नहीं
करुणा के
जिनमें
हम व्याकुल
हैं उस दर्शन के।

हीरक चढ़ी
ध्वंस की आँखें
किये शठों की
ऊँची नाकें
ओछी हरकत
काम घिनौने
इच्छाओं
की बिखरी पाँखें 

दुर्दम पीर
लिए हम उभरे
कोने चहके
घर आँगन के।

हम तो रहे
अमीबा जैसे
कटकर जुड़ते
जैसे-तैसे
नंगी सोच
ढिठाई उनकी
पीछे लगी
हुई फिर वैसे

द्वन्द्व युद्ध ही
शेष बचा है
तौर तरीके
व्यर्थ नमन के।
            ◆◆
                
   【4】
।। पाबन्दी ।।
----------------
भरे पेट को खाना खाले
कुर्सी  वाले  को  बैठता---
बैठ जरा ! कुछ बोल बता ले।
नहीं जला जिस घर में चूल्हा
उसको कहता भग जा साले।।

धनवानों को नमन बन्दगी
वही सोच है ! वही गन्दगी
जली भुनी निर्धन सुनता है--
सेवा  देते  कटे  जिन्दगी ।

एक जतन कर पूरे मन से
खोल बन्द भीतर के ताले।।

रहे बहुत सोहबत के छोटे
गोल नहीं जो पहिए होते
रुकते नहीं चलन में रहते--
मार्केट  के  सिक्के  खोटे।

बहुत ज़रूरी इन्हें रोकना
जबरन में जो गये उछाले।।

कई अनर्गल काम किये हैं
उसकी दौलत जोड़ लिये हैं
चाहे  जिसे  खरीदें--बेचें--
कैसा डर हम होंठ सिये हैं।

पूछ-परख में रख पाबन्दी
गोबर नहीं गणेश बना ले।।
            ◆◆

【5】
।। मोल हवा का ।।
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धुआँ उड़ाते
रात काट दी
हाँहें-साँसें दिन में।
बनी प्रतिष्ठा
लगी दांव में
पलक झपकते छिन में।

अगर भूल से
भूल हुई तो
किया नहीं अनदेखा
रहे भगीरथ
कर्म सदा से
खींची लम्बी रेखा

हरे आज भी
जख़्म पुराने
दवा लगाई जिनमें।

मोल हवा का
तब कुछ समझे
साँसें रुकीं अचानक
गुब्बारे -सा उड़े
गगन में
टूटे पड़े कथानक

जीवन भर
हम रहे नाचते
छोटी-छोटी पिन में।

अपने चित की
बात करें क्या
डर कर चलता है
नब्ज समय की
पकड़ हाथ में
दूर निकलता है

चिंताओं के
तोड़ बखेड़े
बँधने लगा सुदिन में।
              ◆◆

    【6】
    ।। एक दहक आकार ।।
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[डॉ.शम्भुनाथ सिंह को याद करते हुए]

हमें फ्रेम के
अन्दर मढ़कर
चले गये तुम छोड़-छांड के।

आदत नहीं 
शलाकाओं की 
बाहर निकले तोड़-ताड़ के।

बन्द गुफा के
भीतर तुमने
वर्षों रात गुजारे दिन थे।

लगें खिलौना
प्राणहीन हम
नज़र तुम्हारी ताकत बिन थे।

बीज पेड़ के
हम अँकुराये
निकले पत्थर फोड़-फाड़ के।

कोई चीज
आग की रोड़ा
कैसे कहाँ भला कब बनतीं।

एक दहक
आकर दिलाये
लपटें उसकी छतरी तनतीं।

जिसने रोका
लिंगी मारी
रखा उसी को मोड़-मॉड़ के।

तीरंदाजी
नहीं काम की
बेतुक हुआ निशाना साधा।

औरों को
पटखनी लगाने
करते रहे स्वयं बल आधा।

अपने कद को
दिये ऊँचाई
सारी टूटन जोड़-जाड़ के।
              ◆◆

संपर्क सूत्र :
रामकिशोर दहिया
गौर मार्ग, दुर्गा चौक, पोस्ट-जुहला,
खिरहनी, कटनी-483501[म.प्र.] 
 मोबाइल : 97525-39896

गुरुवार, 12 दिसंबर 2019

गजरे बेच रही लड़की

एक नवगीत ----------------------------------
जूड़ा खोले
बाल बखेरे
गजरे बेच रही लड़की।
बाप गाँठता जूते
भैय्या रिक्शा खींचे
गुदड़ी सीती मैय्या
बैठ नीम के नीचे
कड़क ठण्ड सी
झेल रहे सब कड़की।
गली- गली में फिसलन
पाँव नहीं फिसले
मणि वाले नागों के
मुखड़े हैं कुचले
देते रहे मवाली
पग- पग पर घुड़की।
बादल गरजे पानी बरसे
गजरे बेचेगी
घिरे अँधेरे की
लम्बी जुल्फें खींचेगी
रस्ता रोक रही आँधी
तड़क -तड़क बिजली तड़की।
गिन्नी देख इकन्नी
बड़े- बड़े बिक जाते
जी हुजूर की थामे पगड़ी
घुटनों तक झुक जाते
घास -फूँस की बनी रहे छपरी
गरीबी बेच रही लड़की।
◆◆
~ डॉ.मनोहर 'अभय'
नेरुल, नवी मुम्बई