यह सुनकर मेरा पौत्र तो मौन हो गया मगर पन्द्रह वर्ष पूर्व हैदराबाद में गुजारे उन पन्द्रह दिनों की स्मृति पुनः एक बार मेरे मानस पटल पर छा गई।
प्रातः पांच बजे उठ कर चार किलोमीटर टहलने का नियम उन दिनों भी मैंने छोड़ा नहीं था। हैदराबाद के जिस इलाके में हमने घर किराए पर लिया था, वहां सड़कें काफी चौड़ी और मकान प्रायः पांच - छह मंजिल के थे। वहां पर हमारे शहर की तरह लोग सड़क का अतिक्रमण नहीं करते थे, मगर अपने भवन की सीमा के आगे एक - डेढ़ फुट जगह में क्यारी नुमा निर्माण कर फूल के पौधे अवश्य लगा लेते थे। इस प्रकार हर घर के आगे सुंदर पुष्पों से सज्जित पेड़ - पौधे लगे होते थे।
उस शहर की दूसरी विशेषताए जिसने मुझे प्रभावित किया था, वह थी हर घर के आगे सुंदर रंगोली। प्रातः ही गृह - स्वामिनियां अपने द्वार के आगे की थोड़ी सड़क , फुटपाथ को धोकर द्वार के ठीक सामने सुंदर रंगोली बनाती थीं। हर घर के सामने एक अलग बनावट की रंगोली, एक से एक सुंदर रंगोली। पता नहीं, यह रंगोली गृह स्वामिनी द्वारा समृद्धि की देवी लक्ष्मी के आह्वान हेतु बनाई जाती है, अतिथि के स्वागत हेतु बनाई जाती है या गृह की शोभा हेतु बनाई जाती है । मगर हर रोज हर घर के सामने रंगोली की बनावट बदली हुई होती थी। नित्य ही नई नई रंगोली बनाने में महिलाओं को अधिक समय भी नहीं लगता था। ऐसा लगता था कि वे सब भांति भांति की रंगोली बनाने में सिद्धहस्त हैं।
मैंने जब हर घर के सामने फूलों की उपलब्धता देखी तो एक पालिथीन की थैली लेकर टहलने के लिए जाने लगा। रास्ते में मैं अपनी पसंद के फूल तोड़ कर उस थैली में रख लेता और स्नान करने के बाद भगवान को वे पुष्प अर्पित कर देता। वहां पर कई प्रकार के गुड़हलए कनेर, चांदनी, बेला आदि के फूल देख कर मुझे बहुत खुशी होती और मैं हर रोज नए किस्म के फूल चुन कर लाता।
अन्ततः मैंने झटके से अपना हाथ छुड़ाया और लम्बे डग भरते हुए चल पड़ा। इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप वह वृद्ध जोर से चिल्लाया। संयोग से उधर से एक नवयुवक आ रहा था। उसने अप्रत्याशित रूप से मेरा हाथ मजबूती से पकड़ लिया और मुझे वृद्ध के पास ले आया। उस युवक का शारीरिक बल आंक कर मैं बिना विरोध किए उसके साथ चल पड़ा। उस युवक ने वृद्ध के पास पहुंच कर उससे तेलगु भाषा में कुछ बात की और फिर मुझसे हिंदी में पूछा - '' ये फूल किसके हैं ''
मैं समझ गया कि अब यह युवक मुझे दण्डित करेगा। अतः मैंने भोलेपन का नाटक करते हुए कहा - '' इन दादाजी के।''
- भगवान जी ने।
इस पर उस युवक ने हंसते हुए कहा - '' ये फूल आप भगवान को अर्पित करेंगे।''
यह सुनकर मैंने कहा - '' हां।''
- तो इसमें गलत क्या है। भगवान के फूल हैं और उन्हें ही आप अर्पित करेंगे। तो रुक क्यों गए और तोड़ लीजिए। तमाम फूल लगे हैं। ... यह दादाजी आपसे कह रहे थे मगर आप भाग खड़े हुए। इतना कह कर वह युवक जोर से हंसा और एक ओर को चल दिया।
उस वृद्ध ने कुछ फूल अपने हाथ से तोड़ कर मुझे दिए और तेलगु भाषा में कुछ कहा। शायद उसने कहा हो कि कल फिर भगवान की पूजा के लिए फूल ले जाना।
मैं उस वृद्ध की सहृदयता के आगे नतमस्तक हो गया और उसे प्रणाम कर आगे बढ़ गया। मुझे याद आया कि मेरे घर के लान में एक गुड़हल का पेड़ लगा है जिसमें से अक्सर कोई फूल तोड़ लेता था। मुझे इस तरह से फूल का थोड़ा जाना बहुत खराब लगता था। एक दिन मैंने फूल तोड़ने वाले को पकड़ने का निश्चय किया और छिप कर बैठ गया। एक महिला फूल तोड़ने आई तो मैं प्रकट हो गया और उस महिला को बहुत भला - बुरा कहा। इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप उस महिला ने अपने आंचल में रखे सारे फूल वहीं गिरा दिए और दुखी मन से चली गई। उस घटना को याद कर मुझे बहुत अफसोस हुआ और मेरा मन उस महिला से क्षमा मांगने हेतु आकुल हो गया।
मैं नित्य प्रातः भ्रमण पर जाता और सुंदर सुंदर फूल लेकर वापस लौटता। कभी कभी वह वृद्ध मुझे मिल जाते तो मैं उन्हें श्रद्धा पूर्वक प्रणाम करता। कालोनी के गेट पर आकर देखता कि तमाम बच्चे अपने अपने अभिभावक के साथ खड़े स्कूल बस की प्रतीक्षा कर रहे हैं। बस के आते ही कुछ बच्चे उस बस में बैठ जाते और शेष बच्चे अपनी बस के आने की प्रतीक्षा करते। कुछ बच्चे विलम्ब से आते मगर उनके पिता पहले ही आकर खड़े हो जाते और बस ड्राइवर से एक दो मिनट रुकने का आग्रह करते ताकि उनका बच्चा आ जाए।
यह सुनकर मेरी रुचि झा साहब में बढ़ गई। अतः उनसे सामना होने पर मैं उन्हें नमस्कार करने लगा। धीरे - धीरे हम दोनों के बीच बातचीत होने लगी। वैसे भी हिंदी भाषियों में थोड़ा अपनत्व का भाव उत्पन्न हो ही जाता था। उनसे बातचीत में मुझे ज्ञात हुआ कि झा साहब किसी इन्टर कालेज में हिंदी के अध्यापक हैं। उनके इकलौते पुत्र का नाम श्री पति है। उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति बहुत विलम्ब से हुई। इसके लिए उन्होंने अनेक मनौतियां मानी, कई डाक्टरों का लम्बा इलाज चला तब उन्हें अपना कुल दीपक प्राप्त हो सका।
झा साहब और उनकी पत्नी अपने पुत्र की हर इच्छा को पूर्ण करने हेतु सदैव तत्पर रहते थे। उन्होंने समस्तीपुर में अपनी पैतृक संपत्ति बेच कर सुविधा एन्क्लेव में एक फ्लैट अपने पुत्र के नाम में खरीद लिया था। उनका विचार था कि समस्तीपुर की तुलना में हैदराबाद का मौसम स्वास्थ्य के बहुत अनुकूल है तथा पढ़ाई का स्तर भी बहुत अच्छा है। हैदराबाद में नौकरियों की संभावना भी समस्तीपुर की अपेक्षा अधिक ही रहेगी। और इस प्रकार अपने पुत्र के सुखद भविष्य के लिए उन्होंने अपने पैतृक जनपद तक से संबंध विच्छेद कर लिया था।
उस कालोनी में अधिकांश परिवार किरायेदार थे, अतः वे आस पास के लोगों से अधिक संपर्क नहीं रखते थे। कुछ लोग फ्लैट खरीदकर खुद उनमें रहे थे। ऐसे लोग आपस में थोड़ा मेल जोल बना कर रखते थे। सुबह शाम वृद्ध लोग और महिलाएं कालोनी में टहलते थे। शाम को अनेक लोग अपने बच्चों को पार्क में शारीरिक अभ्यास कराते और कालोनी के अन्दर सड़क पर साइकिल चलवाते, फुटबाल, बैडमिंटन, क्रिकेट आदि खिलाते। रविवार के दिन लोग छ : मंजिला कालोनी की छत पर जाकर आधा घंटा धूप में बैठते। मुझे यह फ्लैट संस्कृति कुछ अजीब लगती।
मैं सोचता कि हमारा बचपन जहां बीता वहां तो बच्चों के माता पिता उनकी ऐसी चिंता नहीं करते थे। हम सब तो उन्मुक्त होकर पूरे गांव में धमाचौकड़ी मचाते थे। जब दो.ढाई घंटे घर से बाहर रहते तो अम्मा चिंता करती थीं। और अधिक समय तक गायब रहने पर पिता से शिकायत हो जाती थी जिसके परिणामस्वरूप थोड़ी ठुकाई भी झेलनी पड़ती थी। यहां तो मामला एकदम उलटा ही है।
लम्बी यात्रा पूर्ण कर जब मैं अपने बच्चों के साथ सुविधा एन्क्लेव पहुंचा तो सारा कुछ पहले जैसा ही मिला। बस कोई पुराना चेहरा नहीं दिखाई दिया। वैसे ही स्कूल टाइम पर गेट पर स्कूल बसों का आना, बच्चों का मां - बाप के साथ अपनी बस की प्रतीक्षा, शाम को अपने अभिभावकों की देखरेख में बच्चों का खेल.कूद, रविवार को पुरुषों द्वारा आधा घंटा छत पर धूप का सेवन ....।
- मैं शंभूनाथ हूं, रमेशचन्द्र का पिता। जब तुम आठ - नौ वर्ष के थे तब मैं यहां आया था। उन दिनों मेरी और तुम्हारे पापा की खूब बातें होती थीं। मेरे यह कहने पर वह मुझे पहचान तो नहीं पाया किंतु मुझे घर के अन्दर आने के लिए आमंत्रित करने को विवश अवश्य हो गया। मैंने श्रीपति से उसके माता - पिता से मिलने की इच्छा व्यक्त की तो उसने झिझकते हुए कहा - अंकल ! वे लोग दूसरी जगह रहते हैं।''
- वास्तव में, हम दोनों नौकरी में हैं। इसलिए यहां उनकी ठीक से देखभाल नहीं हो पाती थी। यहां कोई बातचीत करने वाला भी नहीं था, दिन भर मुंह बंद किए बैठे रहते थे। इसलिए हमने एक '' सेवा घर '' में उनके रहने की व्यवस्था कर दी है। हर माह हम लोग सेवा घर को चंदे के रूप में काफी धन दे आते हैं ताकि सेवा घर की प्रबंध समिति के लोग हमारे माता पिता का पूरा ख्याल रखें। श्री पति ने सफाई देने का प्रयास किया।
तभी उसकी पत्नी रसोई से निकल कर हमारे सामने आ गई और बोली - वहां खाने पीने की व्यवस्था एकदम घर जैसी है। उनसे बातचीत करने के लिए आस पास बहुत से हम उम्र लोग हमेशा ही बने रहते हैं।''
घर आकर मैं काफी देर तक इस विषय पर विचार करता रहा कि आखिर रक्त - संबंधों के बीच भी इतनी स्वार्थ परता कैसे बढ़ गई है। तभी मन में यह विचार कौंधा कि हमने अपनी स्वार्थ परता के कारण स्वयं को समाज से काट लिया है। अतः अब हमारे ऊपर कोई सामाजिक बंधन नहीं रह गया है। पहले संतान द्वारा वृद्ध माता पिता की उपेक्षा होते देख जाति.बिरादरी और पास.पड़ोस के लोग टोक दिया करते थे। फिर भी यदि संतान के व्यवहार में परिवर्तन नहीं होता था तो उसका सामाजिक वहिष्कार कर दिया जाता था। आज हम सब स्वयं ही समाज से स्वयं को वहिष्कृत कर लेते हैं या यों कहें कि हम समाज को ही वहिष्कृत कर देते हैं, जिसका परिणाम वृद्धाश्रम के रूप में हमारे सामने आ रहा है।
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