आज के रचना

उहो,अब की पास कर गया ( कहानी ), तमस और साम्‍प्रदायिकता ( आलेख ),समाज सुधारक गुरु संत घासीदास ( आलेख)
छत्‍तीसगढी गीत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
छत्‍तीसगढी गीत लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 1 दिसंबर 2024

जाड़ा


अगहन पूस के जाड़ा।

कपकपा डरिस हाड़ा।

    सुरुज हा निचट घुरघुराय हे।

    रऊंनिया तको नइ जनाय हे।

    ये बबा हा जी गोरसी बारे हे। 

    गोरसी म छेना झिटी डारे हे।  

ये सकलाय हे पुरा पारा।                                 

जाड़ भगाय के हे जुगाड़ा।

अगहन पूस...............।

     लुवई टोरई के दिन आय हे।

     किसान के काम भदराय हे।

     खोजे नइ मिलत बनिहार हे।

     ये उपर ले मौसम के मार हे।

किसान फांदे हे गाड़ा।

लाय बर जात हे भारा। 

अगहन पूस............। 

    भुखहा तन हा कहा जड़ाय हे।

    पेट के आगी हा तो गरमाय हे।

    बादर पानी ले कहा डरराय हे।

    दिन-रात ओहा तो  कमाय हे।

नइ थकय ओखर हाड़ा।

चाहे घाम हो या जाड़ा।

     अगहन पूस के जाड़ा।

     कपकपा डरिस हाड़ा।

*****************************

        *चिन्ता राम धुर्वे*

     ग्राम-सिंगारपुर(पैलीमेटा)

     जिला-के.सी.जी.(छ.ग.)

माटी दीया संवार

        
माटी ले तन,माटी ले धन,माटी ले उजियार,माटी दीया संवार।
बाती बरथे,तेल सिराथे,माटी महिमा अपार, देये दियन अधार।।
पानी ले सुग्घर दीया सिजोये,घीव तेल बने बाती भिंजोये।
रिगबिग-सिगबिग,जुगुर-जागर, देवय सुरुज ल उजियार।।

सबो मनखे माटी के दियना,होवय जी धरम करम सिंगार।
देहरी के दियना,देस खातिर देवय,उँहा सरहद म हुंकार।
बलिदानी जोत जगमग-जगमग,कभू न जेकर डोले पग।
किसन के बड़े भइआ हलधरिया,कहावय माटी के सिंगार।।

मनभावन गजब सुहावन लागय,धन तेरस पहिली तिहार।
सबो के तन मन फ़रियर हरियर,धन्वन्तरी  पूजन दिन वार।।
सब कहिथे धन के तीन गति,खुवार घलो जब नास मति।
शुभता बर सद् बर घर परिवार बर,सगरो जगत बर वार।।

मान बचाये बर कान्हा करिन,बलखरहा नरकासुर संहार। 
सोलह हजार गोपियन के लहुटिस,रूप चौदस सोला सिंगार।।
सुरता लमईया के रक्षा होथे,वईसन पाबे तंय जईसन बोबे।
ग्रह नक्षत्र एकजुवरहा बीरसप्त,का कहिबे टोर भांज शुकरार।।

चिन चिन्हारी मीत मितानी संग हांसत गावत परब तिहार।
लेय-लेय मा कतेक सुलगही,देव"वारी"के दीया ल बार ।।
लक्ष्मी मईया किरपा करही,अन-धन कोठी कुरिया भरही।
अनचिन्हार देहरी ल देवन ,बस एक ठिन"दीया" के उजियार ।।
           रोशन साहू 'मोखला' राजनांदगांव
                   7999840942


शनिवार, 2 नवंबर 2024

आधा अधूरा भागा के काज



बनगे छत्तीसगढ़ राज ,सब करें नाज।

फेर आधा अधूरा,भाखा के हे काज ।


चोबीस साल होगे, कई घ सवाल होगे।

कहत कहत थकेंन,कहे म लागे लाज।


अपन भाखा जेहर, दर्जा बर तरसे।

परके भाखा बन फिरे,हमर महराज।


कतको सभा होइस, कतको भाषन हे।

मुंह ताकत बइठे, छत्तीसगढ़ीया समाज।


आंखी म सबके झूले ,आठवीं अनुसूची।

भाखा ल मिल जातीस ,कहों एकर ताज।


सुरता करांव संगी,मन बात हर आगे।

भले मोर कविता पढ़इया,होवय नाराज।


गिरधारी लाल चौहान 

सक्ती छत्तीसगढ़

शुक्रवार, 1 नवंबर 2024

छत्तीसगढ़ महतारी



छत्तीसगढ़ के चंदन माटी,सोन कस धान उगाथे।

तेकरे सेती छत्तीसगढ़ हा,धान के कटोरा कहाथे।।

करमा ददरिया पंथी सुआ, गीत ल जम्मो गाथे।

छत्तीसगढ़ी गुरतुर बोली, सब्बो के मन ल भाथे।।

छत्तीसगढिया सबले बढ़िया,कइथे हमला भइया।

छत्तीसगढ़ मईया के सुग्घर, परँव मँय हा पँइया।।


तोर कोरा म उपजे धान, तिवरा राहेर उनहारी।

नरवा गरवा घुरवा बारी, हावय तोर चिनहारी।

मेहनत करथे तोर कोरा म,करथे खेती किसानी,

किसिम किसिम के फसल लगाथे,बोथे आनी बानी।

कहाँ जाबे छोड़ के संगी,अपन छइहाँ भुईयाँ,

छत्तीसगढ़ मईया के सुग्घर,परँव मैं हा पइयाँ।।


कल कल कल बहत रइथे ,नदिया नरवा के पानी।

जीव जंतु के पियास बुझाके,बचावत हे जिनगानी।।

तोर कोरा म परबत पहाड़,घाट अऊ जंगल झाड़ी।

सुख -शांति से चलत राहय, जिनगी के ये गाड़ी।

तिहार बार म जम्मो मनखे,नाचय ता ता थईया।

छत्तीसगढ़ मईया के सुग्घर,परँव मँय हा पइयाँ।।


 ©- लोकनाथ ताण्डेय 'मधुर'

      भण्डोरा,बिलाईगढ़,

जिला-सारंगढ-बिलाईगढ़(छग)

छत्तीसगढ़ महतारी



देखव छत्तीसगढ़ बने ले, मिलिस नवा पहिचान।

महतारी के मान बढ़े हे,  सुनले मोर मितान।।


किसम-किसम के लोक गीत हे, रोज मया बगराय।

करमा-पंथी सुवा-ददरिया, सबके मन ला भाय।।

एकर महिमा हावय भारी, कइसे करँव बखान।

महतारी के मान बढ़े हे,  सुनले मोर मितान।।


धनहा-डोली टिकरा टाँगर, धान पान लहराय।

होत बिहिनिया चिरई-चिरगुन, गीत मया के गाय।।

बोली भाखा मीठ इहाँ के, मीत मयारू जान।

महतारी के मान बढ़े हे,  सुनले मोर मितान।।


आनी-बानी जुरमिल जम्मों, मानँय तीज तिहार।

होली-अक्ती परब हरेली,  हावय तीजा सार।।

लोहा-टीना चूना-पखरा, एकर भरे खदान।

महतारी के मान बढ़े हे,  सुनले मोर मितान।।


अंगाकर अउ गुरहा बजिया, सुनके टपकय लार।

बोहावत हे महानदी अउ, अरपा पैरी धार।।

चंदन कस माटी हे एकर, पाये जी बरदान।

महतारी के मान बढ़े है,  सुनले मोर मितान।।


मुकेश उइके "मयारू"

ग्राम- चेपा, पाली, कोरबा(छ.ग.)

गुरुवार, 31 अक्टूबर 2024

कब तक किसने लिखबो


कब तक ले लिखबो लिखरी

चूक-चूक ले हे माला-फुंदरी,

बहूँटा भर-भर हे सुघ्घर चुरी

मुड़ म पागा उप्पर हे खुमरी !


चटनी-बासी,आमा के अथान

तिवरा, चेच, पटुवा के बखान ,

डंवर  अउ  गुरमटिया के धान

मोर कुंदरा ल महल तँय जान !


गुलगुल भजिया,चाँउर चीला

हम  आवन  किसनहा  पिला ,

काहत हँव मँय बात सहीं ला

छकत हम खाथन माईपिला !


ये  सुत उठ के  बड़े बिहनिया

खेत जाथन जी धर के पनिया,

धरती  के हम  हन जी गुनिया

ठाड़ बेरा  बासी  लाथे पुनिया !


नांगर-बइला हे जी हमर परान

हम सङ्गी ये भूंईंयाँ के भगवान,

छत्तीस गढ़िया  सबले  बढ़िया

जय जवान,जय-जय किसान !


कब तक अइसन गीत ल गाबो

हम कमाथन  अउ मुहूँ लमाबो,

अपन कमई के दाम कब पाबो

उँखर मुहूँ म तारा कब लगाबो !


       -- *राजकुमार 'मसखरे'*

रविवार, 27 अक्टूबर 2024

देवारी


काम बूता हर बढ़गे हावय भारी।

लीपा बाहरा ग अपन घर दूवारी

बूता काम म थक जाथे महतारी।। 


ढेला माटी के खनाई म हाथ मा

ओमन के फोरा हर तो पर गे हे।

माटी गोटी करे के बेरा म तो जी

गोड़ म बमरी कांटा हर गड़ गेहे।।


घर के लिपाई पोताई म हाथ ल

चूना हर तो बड़  चरत जावत हे। 

भात साग ला खाय पीये के बेरा

हाथ हर अबड़ तो भरभरावत हे।।


घर के सबो समान मन ला टार

टार के जमाई म देंह हर थकगे।

ए साल के दिवाली के जी काम 

बूता मा मोर महतारी हर भजगे।।


माईलोगन मन कतको बूता ला 

करय कहूं उकर गुन नई मानय। 

हरेक घर के डौउका,लइका मन

माईलोगन मन ल ग चिल्लावय।।

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

✍️ईश्वर"भास्कर"/ग्राम-किरारी।अब अवइया हावय जी दिवाली

काम बूता हर बढ़गे हावय भारी।

लीपा बाहरा ग अपन घर दूवारी

बूता काम म थक जाथे महतारी।। 


ढेला माटी के खनाई म हाथ मा

ओमन के फोरा हर तो पर गे हे।

माटी गोटी करे के बेरा म तो जी

गोड़ म बमरी कांटा हर गड़ गेहे।।


घर के लिपाई पोताई म हाथ ल

चूना हर तो बड़ चरत जावत हे। 

भात साग ला खाय पीये के बेरा

हाथ हर अबड़ तो भरभरावत हे।।


घर के सबो समान मन ला टार

टार के जमाई म देंह हर थकगे।

ए साल के दिवाली के जी काम 

बूता मा मोर महतारी हर भजगे।।


माईलोगन मन कतको बूता ला 

करय कहूं उकर गुन नई मानय। 

हरेक घर के डौउका,लइका मन

माईलोगन मन ल ग चिल्लावय।।

🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏

✍️ईश्वर"भास्कर"/ग्राम-किरारी।

मंगलवार, 8 अक्टूबर 2024

।। चुनबे छाँट निमार ।।

 

                  रोशन साहू ( मोखला )
 
आगे  हावय लोकतंत्र के, सबले  बड़े  तिहार ।
झन भुलाबे वोटिंग तारीख , दिन  तिथि वार।।
जग मा बड़का  लोकतंत्र, हमर भारत  भुइयाँ ।
जनता ले जनता बर इँहा , जनता के सरकार।।

सुजानिक बुधियार ग संगी,तँय गजब हुसियार।
वोट डारे बर जाबे संगी, थोकिन काज बिसार।।
चल गा होरी,चल हल्कू,बहिनी धनिया,झुनिया।
चलव जुम्मन शेख,चौधरी,चलव ग झारा-झार।।

भड़कौनी मा झन आबे संगी,चुनबे छाँट निमार ।
लालच के घर खाली होथे,मन हावय उजियार ।।
काम-कमई,सरदी-गरमी,छट्ठी-बरही जिनगी भर।
पहिली वोट डारबे त खाबे,बिहाव मा लाड़ू चार।।

जिंहा नइहे लोकतंत्र उँहा,कपटी गरकट्टा सरकार।
खून-खराबा तानाशाही अउ अड़बड़ अतियाचार।।
टी वी,मोबाईल,पेपर सबो, समाचार ल जानत हव।
पास परोस के देस मा देखव,मचे रहिथे मारामार।।

जनता रूप जनार्दन के ,जनमत  हावय सुख सार।
परजा धरम  निभाबे  पाबे, भारत माता के दुलार।।
दुनिया-दुनिया मा हावे गोठ ,जनतंत्र हमर हे पोठ ।
अंगरी स्याही निसान पाबे ,सँहराही तोला परिवार।।
                  रोशन साहू ( मोखला )
                       7999840942
 
।।फ़क़त राज हूँ मैं।।
खुद को  समझा था तेरी  महफ़िल की रौनक।
हैरान हूँ जो कहा तूने कि सिर्फ किरायेदार हूँ मैं।।

न चुका पाऊँगा मुझे ऐसे न आजमाओ औचक।
दूर से सही बस एक नजर कि तेरा तलबगार हूँ मैं।।

गर पहले मिल पाते तो,लिख पाता औ गीत गजल।
उम्र गुजरी बस यूं ही ,पल दो पल तो जी पाता मै।।

सच कहता तलाश थी ,रहबर रहगुजर की मुझे।
बस मुझको इतना पता,कुछ जख्म तो सी पाता मैं।।

क्या पता पिछला जन्म कुछ ऐसा जो कर गुजरे ।
यूँ न उठता समन्दर कि भर-भर आँसू न बहाता मैं।।

वो  हिसाब लिए है बैठा ,शायद जन्मों-जन्मों का।
लगता हिसाब में गफलत,दुख बेहिसाब न पाता मैं।।

सिर्फ एक अफसाना कि,सुन लो सुनाना है तुझे।
तेरे दर से कईयों बार, लौटाया लौट आया मैं।।

वो कहते बर्बादियों का डगर,मगर संकरी सी भली।
जिस गली में न जाना था,जाकर न लौट पाया मैं।।

तुझे लगता कि फिक्र तेरी,मुझको तो न कभी रही।
बस तेरी इसी बात पे,बार-बार जार-जार रोया मैं।।

अब तो "मैं" खुद ही न रहा,अब तो बस 'तू' ही 'तू' ।
दूर से ही सही देखा तो,अच्छा है खुद को खोया मैं।।

मेरे जूतों से औकात जानने ,है माहिर ये जमाना।
सुनो कि अंतिम सफर में,औरों का मोहताज हूँ मैं।।

चेहरे ,कपड़े से कयास ,तो कभी अल्फ़ाज़ से मेरे।
सबने किए बिन पढ़े प्रमाणित  फ़क़त राज़ हूँ मैं।।
          रोशन साहू 'मोखला' (राजनांदगांव)
                      7999840942
 
।। मंद मंउहा ले मायन नाचा ।।
ढेंकी कुरिया मा ढेंरहा चुपे-चुप,चांटत हावय नून।
मिक्चर लाबे ढेंरहीन थोरकिन, मोर बात ला सुन।।
दूल्हा डउका संग मारत हावन, दूनों आधा-आधा।
सारा डेड़ सारा सकबोन बने,सबो साढू साँझ कुन।।

बर बिहाव मा आवय मजा,जब मन लागय रुमझुन।
सोमरस येला कहिथे ढेंरहीन,जे पियाय पावय पुन।।
तेल हरदी मायन पहिली,हम ला चाही मउहा पानी।
कूलर  पंखा  गद्दा सुपेती, बेवस्था  चाही  झटकुन ।।

मउहा पानी के ढेंरहीन तोला ,कतेक बतावँव गुन ।
शेर नाचा नाचबो  नंगत,जब  बाजही नागिन धुन।।
होरी कस  गदर मताबो, सूपा चरिहा घलो ठठाबो ।
खीरा  गोंदली  चनाये माढ़े, लिमऊ लाबे नानकुन।।

अंटियावत बरतिया जाबोन,हम रहिबोन नंगत टुन्न।
हमर मान ले हावे ढेंरहीन,सबो महूरत सबो सगुन।।
पउवा पानी ले सनमान ,नइ ते हो जावय अपमान।
चड्डी घलो  झन बांचय चाहे, उतरय धोती पतलून ।।
                    रोशन साहू ( मोखला )
                        7999840942 
आवाज........

उनींद अलसाई सी भोर
रहती नित प्रतीक्षारत
आंगन बुहारते
देखूँ मैं  
भोर की किरण
मेरी किंचित इच्छा.....

सूरज पर रख तवे 
सेंकती  नित रोटियाँ 
कि ,जैसे-
मां का घर,
ननिहाल,
अब ससुराल,
रसोई ही मेरी दुनिया।

आँगन के मुंडेर पर चहकती
चिड़ियों का कलरव
सुन पाती हूँ 
खिड़कियों के रास्ते ..
नन्ही चिड़िया को 
दाना चुगाती  माँ.....
कि
तेज होती जाती रोटियाँ बेलने
सेंकने की गति
हाथ अविराम 
ना यति....

हाथों के फफोले का जलन
महसूस होता जब
इनके जीन्स 
सासू माँ की चादर 
बच्चों के कपड़े धोते...

उड़ चलीं
छत पर वे चिड़ियाँ नही है अब
गीत गाती चहकतीं स्वछंद 
जिनके लिए 
नित रख आती 
सकोरे में दाना पानी....
जब मैं कपड़े सुखाने जाती
निहारती उन्हें  कि दिख जाए वे......
कि
आवाज आती 
अरी ओ महारानी!
मेरा खाना तो निकाल
दवाई भी तो लेनी है ?
              रोशन साहू 'मोखला' राजनांदगाँव
                           7999840942

बुधवार, 27 जुलाई 2022

हरेली तिहार

बड़े बिहनिया सूरज जागे। काम काज जम्मो सकलागे।।
खेत खार मनखे हर भागे। परब हरेली संगी आगे।।
नांगर बक्खर रापा गैती। धोये माँजे झटकुन चैती।।
रगड़ रगड़ बइला नउहाये। चंदन बंदन माथ सजाये।।

रदरद रदरद बरसे पानी। लइका लोग करय मनमानी।।
भरे लबालब नदिया तरिया। परे रिहिस जी जेहर परिया।।
दाई चीला मीठ बनाये। गुड़ के चीला भोग लगाये।।
गोल बनाये भइया लोंदी। देखत राहय बइठे कोंदी।।

फूल दूध अउ लोंदी गोला। धर के जाये झटकुन भोला।।
माई लोगिन सब सकलाये। नाग देव ला दूध पियाये।।
हे भगवन रक्षा तै करबे। दुख पीरा ला सब के हरबे।।
खेत खार मा डोलय पाना। तब मनखे ला मिलही दाना।।

रच रच रच रच चढ़हे गेड़ी। टांँग टांँग के राखय एड़ी।।
खो खो फुगड़ी दौड़ लगाये। लइका लोगन सब सकलाये।।
खोंचय भोंदू निमुआ डारा। धर के झोला घूमय पारा।।
कन्द मूल ला घर घर बांँटे। बीमारी ला ओहर काटे।।

बैगा मन हर भूत भगावै। मनखे मन ला अबड़ डरावै।।
अंँधविश्वासी संगी छोड़ो। नाथ शिवा से नाता जोड़ो।।
हमर गाँव के सुघर हरेली। नाचय गावय सखी सहेली।।
साथ रहे के इही निशानी। परब हरेली हवै कहानी।।

रचनाकार
प्रिया देवांगन "प्रियू"
राजिम
जिला - गरियाबंद
छत्तीसगढ़

Priyadewangan1997@gmail.com


बुधवार, 13 जुलाई 2022

दो छत्‍तीसगढ़ी गीत

डॉ.पीसी लाल यादव
 
कथरी-गोदरी म जऊन पले हे

कथरी-गोदरी म जऊन पले हे।
तन ओखर लोहा कस ढले हे।।
पर के हँसी-खुसी खातिर ओ,
बेरा-बखत पानी कस गले हे।।

सुख का ये?कभू जानिस नहीं,
दुख ल दुख कभू मानिस नहीं।
जेठऊरी म घलो हाँसत रहिथे,
छाँव सेती छतरी तानिस नहीं।।
आमा सही लहस के फले हे।कथरी-गोदरी म जऊन पले हे।।

तन ले जब पछिना ओगरथे,
पथरा ले घलो पानी पझरथे।
तब दुनिया पाथे सोन-सिथा,
महल-देऊँर म अंजोर बगरथे।।
आँधी म घलो दीया कस जले हे।कथरी-गोदरी म जऊन पले हे।।

करम ह जेखर रामायेन-गीता,
जिनगी जेखर कथा-कविता।
हक येखर कोनो नंगावय झन,
कोनो लूटे झन सुख-सुभिता।।
गंगा भगीरथ के पाछु चले हे।कथरी-गोदरी म जऊन पले हे।।

जांगर पेरइया ललावत काबर?
ठलहा बइठइया पगुरावत काबर?
परपोसी अमरबेल के खातिर-
पेट-पीठ म फोरा परत काबर?
चिन्हव ओला कोन-कोन छ्ले हे।कथरी-गोदरी म जऊन पले हे।।

मैं बीजा अँव.....

मैं बीजा अँव....मया के बीजा अँव।
अक्ती हरेली भोजली जँवारा,
छेरछेरा पोरा-तीजा अँव।।
मैं बीजा अँव.....

माटी तो माटी ये मोर बर,
पथरा संध म घला जाम जथँव।
जर मोर जतके माटी भीतरी,
ओतके अगास म लाम जथँव।।
तुलसी कबीरा के साखी दोहा,
वेद-पुरान के रिचा अँव।
मैं बीजा अँव.....

दुख-पीरा सहिके जग खातिर,
जेन हा हांसी-खुसी ल बोंथे।
नांगर जोतइया के पाँव चूम,
धन-धन मोर जिनगी होथे।।
दाई - ददा के मया -  दुलार,
डोकरा बबा के खिझा अँव।
मैं बीजा अँव.....

माटी महतारी दुलारे मोला,
सुरुज किरन हा गुदगुदाय।
पिरीत पानी पलोवय बादर,
पवन पुरवाही झुलना झुलाय।
सुख-सुम्मत के फुलवारी मैं,
भाईचारा बाग बगीचा अँव।
मैं बीजा अँव.....

परमारथ बर जिथँव-मरथँव,
रुखवा बनके फुलथँव फरथँव।
नान्हे काया म सिरजन समाय,
सुरुज अंजोर मुठा म धरथँव।
देवारी के दीया-बाती नोहर,
अरथदूज परब गोडिंचा अँव।
मै बीजा अँव.....

मान-गऊन के लोभ ना संसो,
आस-बिसवास जिनगी धारन।
भूख-दुख सहि के पीका फोरँव,
साँस सिरावे झन मोर अकारन।।
माटी बर जेन घेंच कटाइस ओ
बीर नारायण बेटा बीजा अँव।
मैं बीजा अँव.....

            डॉ.पीसी लाल यादव

शुक्रवार, 24 दिसंबर 2021

करव‌ अन्न के मोल


- मनीराम साहू 'मितान'
 
करव‌ अन्न‌ के मोल‌ जी, काम हरय ये नेक।
लगय बछर उपजाय मा, देथव छिन मा फेंक।
सहिके घाम किसान मन, करथें खेत तियार।
घेरी बेरी जोंतथें, खातू माटी डार।
बोये बर दिन रात उँन, कर दथें जी एक।
लगय बछर उपजाय मा, देथव छिन मा फेंक।
नींद कोड़ चत्वारथें, पानी खूब पलाँय।
बरसा झड़ी धुँकान मा, भींजत ठुठर कमाँय।
करथें उँन‌ जी प्रान‌ दे, रइथे बुता जतेक।
लगय बछर उपजाय मा, देथव छिन मा फेंक।
फसल‌ कहूँ अब पाकगे, लुवई मिँजई काम।
खँटथे नित दिन जाड़ मा, मिलय नही आराम।
समझव गुनव किसान सब, सहिथें दरद कतेक।
लगय बछर उपजाय मा, देथव छिन मा फेंक।

सोमवार, 1 फ़रवरी 2021

छेरीक छेरा.....!!

छेरीक छेरा छेर मरकनिन छेरछेरा

माई कोठी के धान ल हेर.....हेरा ......!!


आगे आगे पूस पुन्नी,रिहिस हे बड़ अगोरा

अन्न परब के बड़े तिहार करले संगी जोरा

                     चलो छेर छेराय बर जाबो

                     धर के लाबो झोरा झोरा.....

आजा राजू आजा बंटी,आजा ओ मनटोरा

जम्मों जाबो मजा पाबो, धर ले जी तैं बोरा

                  छत्तीसगढ़ हे धान के कटोरा

                  हमर हे लक्ष्मी दाई के कोरा.....

टेपरा,घंटी,मंजीरा धर ले,धर घांघरा रे शेरा

चुरकी,टोपली धर ले अब लगाबो जी फेरा

                 हम धान बेच के खुशी मनाबो

                खाबो खोवा,जलेबी अउ केरा....

दान पाबो,दान करबो,आये जी सुघ्घर बेरा

चार दिन के हे जिनगानी,झन कर तेरा मेरा

                    अन्नपूर्णा दाई के मया बरसे

                     छलके ढाबा- कोठी घनेरा....


###छेरीक छेरा छेर मरकनिन छेर छेरा

###माई कोठी के धान ल हेर...... हेरा

अरन बरन कोदो दरन,जभे देबे तभे टरन

आये हे अन्नदान परब,छेर-छेरा छेर-छेरा...!


                   --- राजकुमार मसखरे