खेती-खार ह झार बेचागे,
नाँव के रहिगे किसान गो।
सुम्मत के दियना लफलफावत,
आही कब नवा बिहान गो।
मद मदिरा के धार हे लामे,
चिखला माते हे गाँव गो।
भरम-जाल मा फँसके मनखे,
धरम-धजा के नाँव गो।
मेहनत माटी के सिरजइया,
रिहिन कतको सियान गो।
नित-नियाव ल कोन करें अब,
बाचे नइये ईमान गो।
चारों मुड़ा घपटे बन -बदौरी,
कुटहा सुटहा के राज गो।
हरियर डोली धनहा ह पहिरे,
कांक्रीट के अब ताज गो।
खुल्ला घूमत हें लठमार मन,
लाठी भाँजत हाथ गो।
बलखर बघवा कस अउ गरजे,
चेला-चपाटी मन साथ गो।
मति बउराये तेन ज्ञान बाँटत हे,
काहय जिनगी दो दिन के मेला गो।
मया ल मथनी मा मथ ले,
काबर करि अउ झमेला गो।
कालिख रंग मा सब पोताये,
गिरे पड़े हे उतान गो।
भैरा कोंदा लुलवा मन जोहत,
आही कब नवा बिहान गो।
विजेन्द्र कुमार वर्मा
नगरगाँव (धरसीव
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